भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1044, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 1044

हिन्दी निरुक्त ( २७८ ) ९ अ० ४पा० ६ सं० पाप रूप 'द्वेषांसि' शत्रुओं को 'यूयवत्' (अवयावयति) हमसे अलग करती है- नाश करती है। 'अन्या' (पुनः) और दूसरी देवी 'यजमानाय' यजमान के अर्थ 'वसुवने' धनके संभोग के लिये और 'वसुधेयस्य' (वसुधानायच) धनके संग्रह के लिये (वसुवार्याणि' वाञ्छनीय धनों को 'आवक्षत्' (आवहति) लाती है। (ते) वे दोनों देविए 'वीताम्' (पिबेताम्) इस पृषदाज्य (घृत विशेष) को पीवें अथवा [कामयेताम् ] कामना करें। 'यज' यजनकर-यह सम्प्रैष = प्रेरणा है । 'देवीऊर्जाहूती' (३६) (अन्नको उत्पन्न करने वालीं देविये) अथवा द्यावापृथिवी (द्युलोक और पृथिवी लोक) है। अथवा अहोरात्र (दिन और रात्रि) है। शस्य और समा = संवत्सर (देवी ऊर्जाहूती) हैं,-यह कात्थक्य आचार्य मानते हैं। “ तयो० ” उन दोनों का यह सम्प्रैष [ मन्त्र ] है- ॥ ८ [ ४२ ] ॥ (खं० ६) निरु०- “ देवी ऊर्जाहुती इषमूर्जमन्या वक्षत् सग्धिं सपीतिमन्या नवेन पूर्वंदयमानाः स्याम पुराणेन नवंतामूर्ज मूर्जाहुती ऊर्जयमाने अघातां वसुवने वसुधेयस्य वीता॑यज ॥” (य० वा० सं० २८, १६) ॥ देवी ऊर्जाहुती देव्यौ ऊर्जाहात्यौ अन्नं च

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