निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी-निरुक्त ( २७९ ) ६ अ० ४पा० ४ खं० रसं च आवहति-आवहति अन्या सहजग्धिं च सहपीतिं च अन्या, नवेन पूर्वं दयमानाः स्याम पुराणेन नवम्, ताम् ऊर्जम् ऊर्जाहुंती ऊर्जयमाने अधाताम् वसुवनाय च वसुधानाय च । वीतां पिबेताम् । कामयेतां वा । “ यज ”-इति सम्प्रैषः “ यज ”–इति संप्रैषः ॥ ९ [ ४३ ] ॥ इति नवमाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥ ९ (४) ॥ अर्थः-'देवी- ऊर्जाहुती' [ देव्यौ ऊर्जाव्हान्यौ ] ऊर्जा- हानी इस नाम से अन्न के लाने वाली दो 'देविए' [ अन्न- पूर्णाएं ] कही जाती हैं । 'अन्या' उन दोनों में से एक 'इषम्' [ अन्नम् ] [च] ब्रीहि = धान आदि अन्नको 'ऊर्जम्' [रसंच] और धान आदि अन्न को सींचने वाले रस = दुग्ध आदिको आवहन्, [ आवहति ] संमुखभाव से लाती है, और 'अन्या'- दूसरी देवी “ सग्धिं ”)सहजग्धिं ) बन्धुओं के साथ सह- भोजन को और 'सपीतिं' ( सहपीतिंच ) सहपान को (आव- हति ) लाती है अर्थात्-इनदोनों देवियों में से एक देवी अन्न और रस के पहुंचाने का कार्य करती है, औरदूसरी उसकेसह- भोजनऔरसहपानसे उपयोग करनेका अर्थात्-देविये ऐसाकरें, जैसेहम पूर्वोक्त सहभोजन और सहपान करें । तथा वहबहुत अन्नहो, जिससे हम'नवेन'नए धान्य से'पूर्वम्'पुराने धान्यको 'दयमानाः' रक्षा करते हुए 'स्याम' होवें और -'पुराणेन ' पुराने धान्य से 'नवम्' नए धान्य को रक्षा करते हुए होवे।