भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1046

हिन्दी निरुक्त ( २८० ) ६ अ०४ पा० ६ खं० 'ताम्' 'ऊर्जम्' उस ऊर्ज अन्न आदि को 'ऊर्जाहूती' ऊर्जा- हानी देविए' 'ऊर्जयमाने' बल करती हुई 'अधाताम्' हमें देवे' । किस अर्थ ? 'वसुवने' [ वसुखननाय च ] धन के संभोग के लिये 'वसुधेयस्य' ( वसुधानाय ) [ च ] और धन के संग्रह के लिये । 'वीताम्' (पिबेताम् ) वे दोनों देविए' पृषदाज्य (घृत) के अपने अंशको पीवें (कामयेतों वा) अथवा कामना करें । 'यज' हे होतः ! तू यजन कर । यह संप्रैष = प्रेरणा है 'तू यजन कर'- यह सम्प्रैष है ॥ ( ४३ ) ॥ व्याख्या । मूल में “ अन्नं च रसं च आवहति-आवहति अन्या सह जग्धि च सहपीति च अन्या ” ऐसा लेखक प्रमादजन्य अपपाठ है, इसके स्थान में ' अन्नं च रसं च आवहति अन्या, आवहति सहजग्धिं च सहपीतिं च अन्या ऐसा पाठ पढ़ने से अन्वय सुगम हो जाता है। इस पाठ में केवल ' अन्या ' पदको स्थानान्तरितमात्र किया जाता है ॥ ६ ( ४३ ) ॥ इति हिन्दीनिरुक्ते नवमाध्यायस्य चतुर्थः पादः समाप्तः ॥६.४॥ निरुक्त के नवम अध्याय का खण्ड सूत्र- [१ म पा०-] प्रथयांसि (१) अश्वो वोढा ( २ ) मानो मित्रः (३) कनिक्रदत् (४) भद्रं वद (५) संवत्सरम् (६)उपप्रवद (७) प्रावेपामा (८) प्रैते वदन्तु (६) श्रमन्दान (१०)[२यपा०] यज्ञसंयोगात् (११) वनस्पते (१२) उपश्वासय (१३ ) बही- नाम् (१४) अहिरिव (१५) रथे तिष्ठन् (१६) धन्वनागा(१७) वक्ष्यन्ती वेदा (१८) सुपर्णम् (१९) आजङ्घन्ती(२०) यत्किद्धि