भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1038

हिन्दी निरुक्त ( २७३ ) ९ अ० ४पा० ४ सं० पहिले कुल्लू के नीचे होकर मंडी में आती है । फिर जिला कांगड़ा और हुशियार पुर से होती हुई हरि के पत्तन परजो जिला फीरोज पुर और अम्रत सर की सीमा पर है सतलुज नदी से मिलजाती है । यहां से इस नदी का नाम धारा हो जाता है। फिर बहावलपुर की सीमा पर प्रह्लाद पुर के नीचे रावी चेनाव जेहलम नदियां भी जो ऊपर से मिली हुई आती हैं इसमें मिल जाती हैं ॥” (पृ० ४) “सतलुज — जिसका पुराना नाम शतद्रु है । यह नदी तिब्बत के पहाड़ों में से जो झील मान सरोवर के निकट हैं निकलती है। और का हलूर पहाड़ के बीच में से होकर कुल्लू में जाती है । विलासपुर के नीचे जहां पहाड़ में से निकलती है । वहा उसकी दो धारा होगई है । रोपड़ नगर के नीचे आकर दोनों धारा मिल गई हैं। यहां सरकार ने इस नदी में से एक बहुत बड़ी नहर निकाली है फिर छोटा माछियां नामी नगर से होकर फिल्लौ के नीचे आती है । यहां इस नदीपर एक बड़ापुल बांधा हुआ है । बड़ी सड़क और रेलकी सडक इसी पुलपर से होकर जाती है । फिर यहनदी जालन्धर के जिले को फिरोजपुर से अलग करती हुई हरिके पत्तन पर ब्यासा से मिल जाती है ॥” (पृ०३) ब्यासा। नाम से विपाशा और सतलुज नाम से शतद्रु मिलता हुआ है । मन्त्रोक्त वर्णन इस पूर्वोक्त भूगोलसे मिलता हुआ है । पर्वतो से आना और फिर मिलजाना यह दोनों ही बातें मन्त्र में “पर्वतानाम्-उपस्थात्” और “उशती” इन पदों से स्पष्ट उक्त होती हैं। दोनों नदियों को जोघोड़ियों और व्याई हुई गोओं की उपमा मन्त्र में आई है,उससेमन्त्र-