निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २७१ ) ६ अ० ४ पा० ३ खं० ( खं० ३ ) निरु०- "आवा मुपस्थमद्रुहा देवाः सीदन्तु यज्जि याः । इहाद्य सोमपीतये ॥” ( ऋ०सं० २, ८, १०, ६ ) ॥ आसीदन्तु वाम् 'उपस्थम्' उपस्थानम्, अद्रोग्ध- व्ये इति वा । यज्जि याः देवा यज्ञसम्पादिनः इह अद्य सोमपानाय ॥ 'द्यावापृथिव्यौ' व्याख्याते । तयोः एषा भवति- ॥ ३ ( ३७ ) ॥ अर्थः-“आवाम्०” और “द्यावा नः पृथिवी०” इस ऋचा का गृत्समद ऋषि है । हविर्धान (शकट) के प्रवर्तन (चलाने) में विनियोग है । हे हविर्धाने ! 'अद्रुहा' (अद्रोग्धव्ये) नहीं द्रोह करने योग्य तुम दोनों से कहा जाता है-‘इह' यहां 'अद्य' आज 'सोमपानाय' सोमके पीनेके अर्थ 'यज्जि याः' [ यज्ञसम्पादिनः ) यज्ञके सम्पादन करने वाले 'देवाः' देवता 'वाम्' तुम दोनों की उपस्थम्' ( उपस्थानम् ) पीठपर 'आ-सीदन्तु' बैठें (यह हम चाहते हैं ॥ 'द्यावा पृथिव्यौ' (३१) ( द्यौश्च पृथिवी च ) 'द्य' और 'पृथिवी' व्याख्यान किये जाचुके [ ] ॥ “तयोः” उन दोनों (द्यावा पृथिवीयों) की यह ऋचा है- ॥ ३ ( ३७ ) ॥