भारतकोश
संग्रह पर लौटें

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

२. नैगम काण्ड / ऐकपदिक काण्ड (अध्याय ४-६): वैदिक अप्रसिद्ध व अनेकार्थक शब्द विवेचन

भ्यः' 'धूः' धूर्वतेर्वधकर्मणः । इयमपि इतरा धूः- एतस्मादेव । विहन्ति वहम् । धारयते वा । कान्तिकर्माणः उत्तरे धातवः अष्टादश । अन्ननामानि उत्तराणि अष्टाविंशतिः । अन्नं कस्मात् ? आनतं भूतेभ्यः । अत्तेर्वा । अतिकर्माणः उत्तरे धातवो दश । बलनामानि उत्तराणि अष्टाविंशतिः । 'बलं' कस्मात् ? बलं भरं भवति । बिभर्त्तेः । धननामानि उत्तराणि अष्टाविंशतिरेव । धनं कस्मात् ? धिनोति-इति सतः । गोनामानि उत्तराणि नव । क्रुध्यतिकर्माणः उत्तरे धातवो दश । क्रोधनामानि उत्तराणि एकादश । गतिकर्माणः उत्तरे धातवो द्वाविंशत्यतम् । क्षिप्रनामानि उत्तराणि षड्विंशतिः । 'क्षिप्रं' कस्मात् ? संक्षिप्तो विकर्षः । अन्तिकनामानि उत्तराणि एकादश । 'अन्तिकं कस्मात् ? आनीतं भवति ।

४४ ३ अ० २ पा० ३ खं० । संग्रामनामानि उत्तराणि षट्चत्वारिंशत् । 'सङ्ग्रामः' कस्मात् ? सङ्गमनाद्वा । संगरणाद्वा । संगतौ ग्रामौ-इति वा । तत्र 'खलः' इत्येतस्य निगमा भवन्ति ॥ ३ ॥ अर्थ । “दशाववनिभ्यः, इति त्रिष्टुप् छन्दः । अर्बुदः कद्रूपुत्रऋषिः । ग्रावस्तुतो विनियोगः ।” मन्त्रार्थ—हे ऋत्विजो ! तुम इन पाषाणों (लोढ़ों) के लिये स्तुतियोंका उच्चारण करो, दश अङ्गुलियोंसे उपचार या ग्रहण किये जाते हैं, जो दश अङ्गुलियोंसे युक्त होकर पेषण (पीसना) आदि कर्मको वहन या धारण करते हैं । जो कभी जीर्ण नहीं होते, और जो दश अङ्गुलियोंको पीड़न करने वाले हैं । [इस मन्त्रमें बाईस (२२) अङ्गुलि नामोमेसे 'अवनि' 'कक्ष्या' 'योक्त' 'योजन' और 'अमीशु' ये पाँच नाम एक साथ तथा एकही स्थानमें आये हुए हैं। अतः आरम्भके पाँच पदोंका एकही अर्थ है। एवम् यह अकेलाही मन्त्र अङ्गुलिके अनेक नामोंका निगम बन जाता है, यह इसका एक वैचित्र्य है।] नि० अ०--'अवनि' अङ्गुलि होती हैं । [क्योंकि-] ये कर्मों- को अवन या रक्षण करती हैं। 'कक्ष्या' [क्यों ?-] कर्मोंको प्रकाश करती हैं। 'योक्त' पद 'योजन' इस पदसेही व्याख्यान किया गया है। [और योजन पद स्वयम् प्रसिद्धार्थ है ।] 'अभीशु'[क्यों?] कर्मोंको आभिमुख्य (संमुखता) से व्यापन करतो हैं। [४र्थ पाद ] “दश धुरो दश युक्ता वहद्म्यः”। ‘धूः' 'धुर्' शब्द वध अर्थमें

हिन्दी निरुक्त । ४५ 'धुर्व्' (स्वादि० प०) धातुसे है। यहभी 'दूसरी धूर्' (धुरी या भार) जो बैल आदिसे सम्बन्ध रखतीहै बेल या घोड़ा उसे मारती है। अथवा 'धारयति' (धारणार्थक 'धृञ्' चु० उ०) धातु- से है। अङ्गुलि नामोंके अनन्तर अठारह (१८) कान्ति (कामना) अर्थवाले धातु हैं। कान्त्यर्थक धातुओंके अनन्तर अट्ठाईस (२८) अन्नके नाम हैं। “अन्न” किस अर्थसे हैं? भूतो य' प्राणियोंके सामने संमुख भावसे झुक जाता है। (आङ् उप० 'नम्' (भ्वा० प०) धा०) । अथवा 'अद' भक्षणे (अदा० प०) धातुसे है। क्योकि-प्राणी उसे खाते हैं। अन्न नामोंके अनन्तर दश (१०) अति भक्षण) अर्थवाले धातु हैं। अत्तिकर्म धातुओंके अनन्तर अठाईस (२८) बलके नाम हैं। 'बल' क्यों ? [जोही पुरुष गर्व करता है वह उससे भरण या धारण किया जाता है। 'बल' भर होता है। 'डुभृञ् धारणपोषणयोः' (तु० उ०) धातुसे है। बल नामोंके अनन्तर अट्ठाईस (२८) ही धनके नाम हैं। 'धन' किस अर्थसे है ? 'धिनोति' (धि-धा० स्वा० उ०) इस कर्तृवाच्य तर्पणार्थक धातुसे है। [क्योंकि-वह प्राप्त होकर पुरुषको तृप्त कर देता है] धन नामोंके अनन्तर नव (६) गोके नाम हैं। गो नामोंके अनन्तर दश (१०) क्रोधार्थक धातु हैं। क्रधार्थक धातुओंके अनन्तर ग्यारह (११) क्रोधके नाम हैं। क्रोध नामोंके अनन्तर गति अर्थवाले एकसौ बाईस (१२२) धातु हैं। गत्यर्थक धातुओंके अनन्तर (२६) क्षिप्र (शीघ्र) के नाम हैं। 'क्षिप्र' किस अर्थसे है ? विशेष रूपसे खैंचा हुआ या संक्षिप्त किया हुआ कहा जाता है।

४६ ३ अ० २ पा० ३ ख० । क्षिप्रनामोंके अनन्तर ग्यारह (११) अन्तिक (समीप) के नाम हैं। 'अन्तिक' किस अर्थ से है ? [क्योंकि] वह लाया हुआ होता है। अन्तिक नामोंके अनन्तर छियालीस (४६) संग्रामके नाम हैं। 'संग्राम' किस अर्थ से है। सङ्गमन या दोओंके मिलनेसे। अथवा उसमें एक दूसरा अपने शत्रुके प्रति संगरण या शब्द करता है, या उक्ति प्रत्युक्ति करता है। अथवा उसमें दो समूह परस्परके जोतने की इच्छासे मिलते हैं। तहाँ 'खल' इस नामके निगम हैं ॥ ३ ॥ व्याख्या । निगम का प्रयोजन। “दशावनिभ्यः” यह निगम इसलिये दिया गया कि अङ्गुलि नामोंमें से कई नाम और और अर्थोंमें भी आये हुए हैं। जैसे कि-नदी नामोंमें (अध्याय १ खण्ड १३) 'अवनि' शब्द और रश्मि नामोंमें (अ० १ खं० ५) 'अभीशु' शब्द, इस कारण उनकी सन्दिग्धता मिटाई जावे अथवा अङ्गुलि अर्थको निश्चय कराया जावे। मन्त्रमें अवनि आदि पाँचों पदोंके साथ 'दश' संख्यावाचक शब्दके विशेषण होने, उनके अर्थोंमें जो क्रियाएँ हैं, उनसे तथा लोढ़िके सम्बन्धसे ये पाँचो शब्द यहाँ पर अङ्गुलिके ही नाम हो सकते हैं, नदी या रश्मिके नहीं। अनेक अङ्गुलि नामोंको एक ही स्थानमें जो मन्त्रमें दे रहा हैं, वह भिन्न भिन्न शब्दोंके द्वारा अङ्गुलियोमे होनेवाली भिन्न भिन्न क्रियाओंके जतानेके लिये है। जैसे कर्मकी रक्षा, कर्मका प्रकाश, कर्मकी योजना, कर्मको व्याप्त करना आदि । ग्रावस्तुतिमें अनेक अङ्गुलि नामोंका एक साथ उपयोग यह है कि-अनेक क्रियावाली अङ्गुलियोंसे ये ग्रहण किये जाते हैं, इससे उनकी स्तुति करो।

हिन्दी निरुक्त। ४७ सङ्गतार्थ--क्योंकि-बाहु सहित अङ्गुलि सहित पुरुषकी व्याख्या हो चुकी है, इससे अब पुरुषको प्रथम कामहीने प्रवेश किया इस कारण कान्ति या काम अर्थ वाले धातु कहे गये हैं। अथवा कान्ति नाम सौन्दर्यका है। क्योंकि-जो वस्तु असुन्दर होती है, वह अङ्गुलियोंसे ही सुन्दर की जाती है, इस कारण अङ्गुलि नामोंके अनन्तर कान्ति अर्थ वाले धातु कहे गये हैं। सब पदार्थोंकी अपेक्षा अन्न ही कान्त या प्रिय होता है, इसलिये कान्त्यर्थक धातुओंके अनन्तर अन्न नाम हैं। अन्न ही खाया जाता है, इससे अन्न नामोंके अनन्तर अत्तिकर्म धातु है। क्योंकि-जो ही खाते हैं, बलवान् होते हैं, इसलिये अत्ति कर्म धातुओंके अनन्तर बलके नाम हैं। क्योंकि-जो बलवान् होते है वे ही धनको प्राप्त होते हैं, इस कारण बल नामोंके अनन्तर धनके नाम हैं। सब धनोंमें गोधन ही उत्तम धन है, इस कारण धन नामोंके अनन्तर गो नाम है। धन या गोके अर्थ ही क्रोध होता है, इसलिये गो नामोंके अनन्तर क्रोधार्थ धातु हैं। क्रोध अर्थ के सम्बन्धसे ही क्रोध नाम कहे गये हैं। क्रुद्ध होकर ही सुतराम् गमन करते हैं, इससे क्रोध नामोंके अनन्तर गत्यर्थक धातु हैं। गमन ही से शीघ्र कहा जाता है, इससे गत्यर्थक धातुओंके अनन्तर क्षिप्र ( शीघ्र ) नाम हैं। क्योंकि-शीघ्र चलने वाले ही, अपने वाञ्छित स्थानके निकट होते हैं, इससे शीघ्र नामोंके अनन्तर अन्तिक नाम हैं। समीपमें हुए हुए योधोंका ही संग्राम होता है, इसलिये अन्तिक नामोंके अनन्तर संग्रामके नाम हैं।

४८ ३ अ० २ पा० ४ खं० । ( खण्ड ४ ) [ निघ० ] इन्वति ( १ ) । नक्षति ( २ ) । आक्षाणः ( ३ ) । आनट् ( ४ ) । आट ( ५ ) । आपानः ( ६ ) । अशत् ( ७ ) नशत् ( ८ ) आनशे ( ९ ) । अश्नुतः ( १० ) । इति दश व्याप्ति- कर्म्माणः । [ निघ० ] दम्भ्नोति ( १ ) । श्रथति ( २ । ) ध्वरति ( ३ ) । धूर्वति ( ४ ) । वृणक्ति ( ५ ) । वृश्चति ( ६ ) । कृण्वति ( ७ ) । कृन्तति ( ८ ) । श्वसिति ( ९ ) । नभते ( १० ) । अर्दयति ( ११ ) । स्तृणाति ( १२ ) । स्नेहयति ( १३ ) । यातयति ( १४ ) । स्फुरति ( १५ ) । स्फुलति ( १६ ) । निष- प्सु ( १७ ) । अवतिरति ( १८ ) । वियातः ( १९ ) । आतिरत् ( २० ) । तलित् ( २१ ) । आखण्डल ( २२ ) । द्रूणाति ( २३ ) । रम्र्णाति ( २४ ) । शृणाति ( २५ ) । शम्नाति ( २६ ) । तृणेढ्वहि ( २७ ) । ताढ्वहि ( २८ ) । नितोषते ( २९ ) । निवर्हयति । ( ३० ) । मिनाति ( ३१ ) । मिनोति ( ३२ ) । धमति ( ३३ ) । इति त्रयस्त्रिंशद् वधकर्म्माणः ॥ १८ ॥

हिन्दी निरुक्त । ५३ [ नि० ] "अभिददेकमेको अस्मि निष्षाडभीद्वा किमु त्रयः किरन्ति । खले न पर्षान् प्रतिहन्मि भूरि किं मा निन्दन्ति शत्रवोऽनिन्द्राः ॥” [ ऋ० सं० ८, १, ६, २ ] अभिभवामि-इदमेकमेकोऽस्मि । निष्षड्मातः सपत्नान् अभिभवामि द्वौ । किं मा त्रयः कुर्वन्ति । 'एकः' इता संख्या । 'द्वौ' द्रुततरा संख्या । 'त्रयः' तीर्णतमा संख्या । 'चत्वारः' चलिततमा संख्या । 'अष्टौ' अश्नोतेः । 'नव' न वननीया । नावाप्ता वा । 'दश' दप्ता दृष्टार्था वा । 'विंशतिः' द्विदशतः । 'शतं' दश दशतः । 'सहस्रं' सहस्वत् 'अयुतं' 'नियुतं' 'प्रयुतं' तत्तदभ्यस्तम् । अर्बुदो मेघो भवति । उदकम्-‘अम्बु’ । ‘तद्दोऽम्बुदः’ । अम्बु मद् भाति इति वा । अम्बु मद् भवति इति वा । स यथा महान् बहुर्भवति वर्षं स्तदिबार्बुदम् "खले न पर्षान् प्रतिहन्मि भूरि ।" खल इव पर्षान् प्रतिहन्मि भूरि । 'खल' इति संग्राम नाम । खजतेर्वा । स्खलतेर्वा । अयमपि इतरः खल एतस्मादेव । समास्कन्नो भवति । “किं मा निन्दन्ति शत्रवोऽनिन्द्राः ।" ये कृन्द्रं ७

५० ३ अ० २ पा० ४ खं० ।

न विदुः । 'इन्द्रो हि अहम् अस्मि, अनिन्द्रा इतरे-इति वा। व्याप्तिकर्माणः उत्तरे धातवो दश । तत्र द्वे नामनौ । 'आशानः' आशु वानः । 'आपानः' आप्नु- वानः । वधकर्माणः उत्तरे धातवस्त्रयस्त्रिंशत् । तत्र 'वियातः' इत्येतद् वियातयत इति वा । वियातयेति वा । "आखण्डल प्रहूयसे ।" आखण्डयितः । 'तडित्' इति अन्तिका-वधयोः । संसृष्ट-कर्म ताडयति इति सतः ॥ ४ ॥ अर्थ । "अभोदम्" इस मन्त्रका वैकुण्ठ इन्द्र पुत्र ऋषि । जगती छन्दः । दश रात्रके नवम अहन् ( दिन ) में निष्केवल्यमें शस्त्र ।" 'आध्या- त्मिक मन्त्र ।" मन्त्रार्थ-मैं अकेला ही शत्रुओंको दबाता हुआ इस जगत्का अभिभव ( तिरस्कार ) या आधिपत्य करता हूं । किस प्रकार ? यदि एक शत्रु आता है, तो अकेला हो उसे हरा देता हूं । दोओंको भी आये हुओको अकेला ही हरा देता हूं । और क्या ? तीन भी एक साथ आए हुए मेरे अकेलेका क्या कर सकते हैं ? [ किन्तु कुछ नहीं-यह अभिप्राय है । ] बहुत क्या ? खल या खलीमें जिस प्रकार कर्षक लोग बहुत सञ्चित धान्योंको भी सहजमें गाह डालते हैं, उसी प्रकार संग्राममें मैं निष्ठुर ( कठोर ) शत्रुओंको भी क्षण ही में मार देता हूं । मेरा ऐसा प्रभाव होने पर भी इन्द्र रहित या इन्द्र भिन्न या इन्द्रको न जानने वाले शत्रु मेरी क्या निन्दा कर सकते हैं ? अर्थात् मैं निन्दाके योग्य नहीं बल्कि स्तुति करने योग्य हूं ॥

( नि० अ० ) मैं एक इस एक जगत्को तिरस्कार करता हूं । शत्रु ओंको तिरस्कार करता हुआ दो को ( भी ) तिरस्कार करता हूं । क्या मेरा तीन कर सकते हैं ? [ एक पद निरुक्त ] 'एक' इत या प्राप्त संख्या । [ दो आदि अन्य संख्याओंमें भी गई हुई रहती है । ] 'द्वि' अधिक फैली हुई संख्या । [ एक की अपेक्षासे । ] 'त्रि' अधिकसे अधिक तैरो हुई संख्या । [ दो की अपेक्षा । ] 'चतुर' बहुत चली हुई संख्या [ तीनकी अपेक्षा । ] 'अष्ट' व्याप्ति अर्थमें 'अश्' ( स्वा० आ० ) धातुसे है । [ क्योंकि वे सातको व्यापन करके रहते हैं ] 'नव' यह संख्या 'न वननीय' या वाञ्छनीय नहीं है । [ क्योंकि-नव ( ६ ) संख्या वाली तिथि नवमीमें कोई शुभ कर्म नहीं होता । ] 'दश' यह संख्या दस्ता या सब संख्याओं- का अन्त करने वाली है । अथवा दृष्टार्थ होनेसे 'दश' है । [ क्योंकि-एकादश द्वादश आदि संख्याओंके ऊपर फिर फिर देखी जाती है । ] 'विंशति' दो वार दशसे । 'शत' दश वार दशसे । 'सहस्र' क्यों ? सहस् नाम बलका है, सहस् वाला होनेसे 'सहस्र' है । [ क्योंकि दुर्बलोंका भी सहस्र बलवान् ही होता है । ] 'अयुत' 'नियुत' 'प्रयुत' उस उसको दश दश वार अभ्यास करनेसे होते हैं । [ अर्थात् सहस्र दश वार अभ्यास किया गया 'अयुत', अयुत दश वार अभ्यस्त 'नियुत', और नियुत दश वार अभ्यस्त प्रयुत होता है । ] 'अर्बुद' मेघ है । [ मेघ सादृश्यसे है । ] 'अम्बु' क्यों ? अरण या चलन करता है । उस ( जल ) को देने वाला 'अम्बुद' । [ अर्थात् अम्बुदसे 'अर्बुद' होता है । ] अथवा अम्बुमान् भान होता है । अथवा अम्बुवाला होता है । वह ( मेघ ) जिस प्रकार जलको बरसता हुआ महान् ( बड़ा ) बहु ( बहुत ) होता है, उसके समान बहु द्रव्य 'अर्बुद' कहाता है । [ ३य पाद ] "खले न पर्षान् प्रतिहन्मि भूरि।" अर्थात् खल (खाता) में

५२ ३ अ० २ पा० ४ खं० । धान्योंको जैसे, बहु कठोर शत्रु ओंको प्रतिघात करता हूं। 'खल' यह संग्रामका नाम है। भ्रंशार्थक 'खल' (भ्वा० प०) धातुसे है। [क्योंकि उसमें योद्धा गिरते हैं।] अथवा हिंसार्थक 'स्खल' (भ्वा० प०) धातुसे। [क्योंकि—इसमें योद्धा परस्परसे हिंसा किये जाते हैं।] यह भी दूसरा (धान्य) खल इसी (अर्थ) से है। [क्योंकि उसमें भी धान्य चूर्ण हो हो कर गिरते हैं। अथवा हिंसा किये जाते हैं।] [अथवा] धान्योंसे समास्कन्न या बिखरा हुआ होता है, इससे 'खल' है। [४र्थ पाद् ] “किं मा निन्दन्ति शत्रवोऽनिन्द्राः!” अर्थात् अनिन्द्र शत्रु मुझे क्या निन्दा कर सकते हैं। [अनिन्द्र क्या?] जो इन्द्रको नहीं जानते हैं। अथवा क्योंकि मैं इन्द्र हूं, अतः और सब अनिन्द्र हैं। व्याप्ति अर्थ वाले अनन्तर दश धातु हैं। उनमें दो नाम हैं। (१) 'आक्षाण' अशन या व्याप्त करने वाला। (२) 'आपान' व्याप्त होने वाला। अगले वध अर्थमें तेतीस धातु हैं। उनमें 'वियात' यह नाम है। [अर्थ] अथवा जो शत्रु ओंको नाना प्रकारसे कष्ट या यातना देता है। अथवा स्रोताओंसे जो 'वियात्यः' इस प्रकार कहा जाता है। ['आखण्डल' यह भी नाम ही है।] [निगम] “आखण्डल प्रहूयसे।” [ऋ० सं० ६, १, २४, २] अर्थात् हे आखण्डल ! इन्द्र ! तू आदरसे बुलाया जाता है। 'आखण्डल' शत्रुओं या मेघोंका आखण्डयिता खण्डन करने वाला। 'तडित्' यह अन्तिक या समीप अर्थमें संसर्ग रखने वाला है। 'ताडयति' ताडन करता है, इस कर्तृ वाच्यसे है ॥ ४॥ व्याख्या ! "अभोवम्" मन्त्र 'खल' शब्दकी व्याख्याके लिये दिया गया है। इसमें इसके संग्राम और खली दोनों अर्थोंका निर्वाह उत्तम प्रकारसे

हिन्दी निरुक्त । ५३ हो जाता है । उपमानमें खली और उपमेयमें संग्राम । 'खले' पदके आगे 'न' पद उपमा वाचक 'यथा' के अर्थमें है । वैकुण्ठका अभिमान । मन्त्रमें वेकुण्ठने जो अभिमान किया है । वह इन्द्र पुत्र होनेके कारणसे है । पुत्र पर पिताका अविकल स्वभाव आना प्राकृतिक है । इसी कारण हिन्दुओंमें कुलीनताका विशेष आदर है ॥ ४ ॥ सङ्कृतियां—क्योंकि संग्राममें परस्परको योध्या व्याप्त करते हैं, इस कारण संग्राम नामोंसे आगे व्याप्ति अर्थ वाले धातु कहे । क्योंकि संग्राममें पहले परस्परको व्यापन करते हैं, और फिर मारते हैं, इससे व्याक्तिकर्म धातुओंके अनन्तर वधकर्म धातु कहे गये ॥ ४ ॥ ( ख० ५ ) [ निघ० ] विद्युत् ( १ )। नेमिः ( २ )। हेतिः ( ३ )। नमः ( ४ )। पविः ( ५ )। सृकः ( ६ )। त्वकः ( ७ )। वधः ( ८ )। वज्रः ( ६ )। अर्कः ( १० )। कुत्सः ( ११ )। कुलिशः ( १२ )। तुजः ( १३ )। तिग्मम् ( १४ )। मेनिः ( १५ )। स्वधितिः ( १६ )। सायकः ( १७ )। परशुः ( १८ )। इति अष्टादश वज्रनामानि ॥ २० ॥ [ निघ० ] इरज्यति ( १ )। पत्यते ( २ )। क्षयति ( ३ )। राजति ( ४ )। इति चत्वारः ऐश्वर्यकर्माणः ॥ २१ ॥

५४ ३ अ० २ पा० खं० ५ । [ निघ० ] राष्टो ( १ ) । अर्यः ( २ ) । नियु- त्वान् ( ३ ) । इन इनः ( ४ ) । इति चत्वारि ईश्वरनामानि ॥ २२ ॥ अपः ( १ ) । तुक् ( २ ) । मनुष्याः ( ३ ) । आयतां ( ४ ) । भग्वः ( ५ ) । वश्मि ( ६ ) । अन्धः ( ७ ) । आवयति ( ८ ) । ओजः ( ९ ) । मघम् (-१०-) । अघ्ना ( ११ ) । रेलते ( १२ ) । हेलः ( १३ ) । वर्त्तते ( १४ ) । नु ( १५ ) । तलित् ( १६ ) । रणः ( १७ ) । इन्व॑ति ( १८ ) । दम्भोति ( १९ ) । दिद्यु॒त ( २० ) । इरज्यति ( २१ ) । राष्टो ( २२ ) । द्वाविंशतिः ( २२ ) ॥ इति निघण्टौ द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ [ निरु० ] “त्वया वयं सुवृधा ब्रह्मणस्पते स्पार्हा वसु मनुष्या ददीमहि । या नो दूरे तडितो या अरातयोऽभिषन्ति जम्भय़ाता अन- प्नसः ॥” [ ऋ० सं० २, ६, ३०, ४ ] त्वया वयं सुवर्द्धयित्रा ब्रह्मणस्पते स्पृहणीयानि वसू नि मनुष्येभ्यः आददीमहि । याश्च नो दूरे

हिन्दी निरुक्त । ५५ तडितो याश्च अन्तिके अरातयः अदान- कर्माणो वा । अदान प्रज्ञा वा । जम्भयता अनमशः । [ एकपद निरुक्तम् ] आभरिति रूप नाम । ‘आप्नोति’ इति विद्युत् ‘तडित्’ भवति । इति शाक पूर्णिः । सा हि अवताडयिति दूराच्च दृश्यते । अपि तु-इदमन्तिकनामैव अभि- प्रेतं स्यात् । “दूरे चित् सन्तडिदिवा तिरोधत्से” । [ ऋ० सं० १, ६, ३१, २ ] दूरेऽपि यन्नन्तिक इव संन्दृश्यते-इति । वज्रनामानि उत्तराणि अष्टादश । ‘वज्रः’ कस्मात् ? वर्जयति इति सतः । तत्र ‘कुत्स’ इत्येतत् कृन्ततेः । ऋषिः ‘कुत्सो’ भवति कर्त्ता स्तोमानाम् इति औपमन्यवः । अत्रापि अस्य वधकर्मैव भवति । “तत्सख इन्द्रः । शुष्णं जघान” इति । ऐश्वर्यकर्म्माणः उत्तरे धातवश्चत्वारः । ईश्वर- नामानि उत्तराणि चत्वारि । तत्र ‘इन’ इति एतत् सनित ऐश्वर्येण वा । सनितमनेन-ऐश्वर्य- मितिवा ॥ ५ ॥

५६ ३ अ० २ पा० ५ खं० । अर्थ । “त्वयावयम्” मन्त्रका गृत्समद ऋषि । जगती छन्दः । प्रवर्ग्यमें विनियोग ।” मन्त्रार्थ—हे ब्रह्मणस्पति देव ! सुन्दर बढ़ानेवाले तुमसे हम वाञ्छनीय धनोंको दाता मनुष्योंसे लेवें । दूर देशमें जो शत्रु और जो निकट देशमें शत्रु हमें तिरस्कार करते हैं उन कर्महीन या रूप हीन शत्रुओंको तुम नाश करो ॥ नि० अ०—हे ब्रह्मणस्पति देव ! तुझ बढ़ानेवालेके कारणसे वाञ्छनीय धनोंको मनुष्योंसे लेवें । जो हमारे दूर देशमें और तडित् या निकटमें शत्रु हैं, हमें वाञ्छित अर्थों को देनेवालेके रोकने वाले या स्वयम् देना नहीं चाहने वाले उन दोनों कुरूपोंको तुम बेचेत करो । [ एक पदानि ] ‘अप्नस्’यह रूपका नाम है ‘आप्नोति’ व्यापन करता है, इस कतृ वाच्य क्रियासे है, ‘तडित्’ विद्युत् या बिजली होती है यह शाकपूर्णि आचार्य मानते हैं । क्योंकि वह ताडन करती है और दूरसे दिखाई देती है । किन्तु यह अन्तिक या समीपका ही नाम अभिप्रायसे हो सकता है । [ उदाहरण ] “दूरमें भी रहता हुआ समीपमें जैसा स्थित हुआ दिखाई पड़ता है।” [ यहाँ ‘तडित्’ शब्दक समीप वाचकता अत्यन्त स्पष्ट है । ] वधकर्म धातुओंके अनन्तर अठारह ( १८ ) वज्रके नाम हैं । ‘वज्र” किस धातुसे है ? ‘वर्जयति’ इस ( चु० उ० ) कर्तृ वाच्य धातुसे है । अर्थात् यह प्राणियोको प्राणोंसे वियुक्त कर देता है । [सन्देह-पद-] उन वज्र नामोंमे ‘कुत्स’ यह पद ‘कृतो’ छेदने ( तु० प० ) धातुसे है । ‘कुत्स’ ऋषि ( भी ) है । क्योंकि वह स्तोम नाम कर्मों का करनेवाला है, यह औपमन्यव आचार्य मानते हैं। इस ( ऋषि ) अर्थमें भी इस धातुका 'वध' अर्थ ही है ।

हिन्दी निरुक्त । ५९ क्योंकि उसके सखा इन्द्रने रसोंको शोषण करने वाले असुर या मेघको मारा है । वज्र नामोंके अनन्तर चार (४) ऐश्वर्य अर्थवाले धातु हैं। ऐश्वर्य कर्म धातुओंके अनन्तर चार (४) ईश्वरके नाम हैं। उन ईश्वरके नामोंमें 'इन' यह क्यों ? ऐश्वर्यसे सनित या व्याप्त है। अथवा इससे ऐश्वर्य व्याप्त है ॥ ५ ॥ व्याख्या । इस खण्डमें 'तडित्' इस सन्दिग्ध पदकी "त्वया वयम्" उदाहरणसे व्याख्या दिखाई कि मन्त्रोंमें यह पद समीप अर्थमें आता है । शाकपूणि आचार्य विद्युत्का नाम भी मानते हैं। किन्तु आचार्यने दूसरे मन्त्रसे भी पूर्व अर्थको ही पुष्ट किया है, जो यहाँ प्रकरणके अनुरूप है । वज्र नामोंमें 'कुत्स' यह सन्दिग्ध पद है। क्योंकि वज्र और ऋषि दोनों अर्थोंमें आता है। ऋषि अर्थका पक्ष औपमन्यव आचार्य लेता है। पर आचार्य पुरा पक्षमें भी इस शब्दके धातुका वध अर्थ ही मानते हैं, जिसे उन्होंने उनके उपास्य देव इन्द्रके द्वारा सिद्ध किया है । "त्वया वयम्" मन्त्रमें गृत्समद ऋषिने अपने ब्रह्मणस्पति देवसे अरातियों या शत्रुओंके नाश करनेकी प्रार्थना की है यहाँ भगवद्दुर्गाचार्यने शत्रुओंके दो भेद बताए हैं । (१) दुःखसंनाश्य जिनका दुःखसे नाश हो सकता है। (२) सुख संनाश्य जिनका सुखसे नाश हो सकता है। पहले भेदमें वे शत्रु हैं, जो यह बुद्धि रखते हैं कि 'हमे' इनके लिये देना नहीं चाहिये। और दूसरे वे हैं, जो औरोंको देते हुओंको रोकें ॥ ५ ॥

५८ ३ अ० २ पा० ६ खं० । ( खण्ड ६ ) [ निरु० ] “यत्रा सुपर्णा अमृतस्य भागमनिमेषं विदथा भिसरन्ति । इनो विश्वस्य भुवनस्य गोपाः समाधीरः पाकमत्राविवेश ॥” [ ऋ० सं० २, ३, १८. १ ] यत्र “सुपर्णाः” सुपतनाः आदित्यरश्मयः- “अमृ- तस्य भागं” मुदकस्य अनिमिषन्तः वेदनेन “अभि- स्वरन्ति”-इति वा, अभिप्रयन्ति-इति वा । ईश्वरः सर्वेषां भूतानां गोपायिता आदित्यः । “स मा धीरः पाकमत्राविवेश”-इति । “धीरः” धीमान् । “पाकः” पक्तव्या भवति । विपक्वप्रज्ञः आदित्यः- इति उपनिषद्वर्णो भवति-इति अधिदैवतम् । अथा- ध्यात्मम् । यत्र सुपर्णाः सुपतनानि इन्द्रियाणि अमृ- तस्य भागं ज्ञानस्य अनिमिषन्तः वेदनेन अभि- स्वरन्ति इति वा, अभिप्रयन्ति इति वा । ईश्वरः सर्वेषाम् इन्द्रियाणां गोपायिता आत्मा “स मा धीरः पाकमत्राविवेश” इति । “धीरः धीमान्” “पाकः” पक्तव्या भवति, विपक्वप्रज्ञः आत्मा इति आत्मगतिमाचष्टे ॥ ६ ॥ इति तृतीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ ३, २, ॥

हिन्दी निरुक्त । ५६ वह मन्त्र जिसमें 'इन' यह ईश्वरका नाम है—"यत्रा सुपर्णा" इत्यादि । इस मन्त्रका दीर्घतमाः ऋषि । त्रिष्टुप् छन्दः । विश्वे- देवाः देवता । महाव्रतमें तृतीय सवनमें वैश्वदेव शस्त्रमें शस्त्र है । मन्त्रार्थ—[देवता पक्ष-] 'यत्र' जिस आदित्य मण्डलमें स्थित हुए हुए 'सुपर्णा' जो अन्धकारको दूर करनेके लिये गिरते हैं अथवा सुन्दर होते हुए गिरते हैं 'अमृत' अमर जलके 'भाग' भजन (सेवन) योग्य अंशको पृथिवी लोकसे लेकर 'विदथा' अपने अधिकारके ज्ञान पूर्वक 'अनिमिष' आलस्य रहित या आदर-युक्त आदित्य- रश्मि 'अभिस्र्वरन्ति' सम्मुख भावसे आदित्य मण्डलको जाते हैं । या लोकको तपाते हैं । उस आदित्य मण्डलमे स्थित हुआ हुआ सब लोकोंका 'इन' ईश्वर 'गोपा' रक्षा करने वाला 'धीर' धीमान् स्वच्छबुद्धि वाला वह आदित्य अनुग्रहसे' अत्र' इस आदित्य मण्ड- लमें मा' 'पाकम्' मुझ अपक्वबुद्धिको 'आविवेश' प्रवेश करे । [आत्मपक्ष-] 'यत्र' जिस शरीरमें 'सुपर्णा' अपने अपने काले बिन्दु आदि स्थानोंमें स्थित हुयी हुयी चक्षु आदि इन्द्रियें 'अमृतस्य' अमर धर्म युक्त ज्ञानको 'भागम्' अपने अपने ग्राह्य रूप आदि विषय रूप रसको लेकर 'अनिमेषम्' आलस्य रहित या आदर युक्त 'विदथा' विषय विज्ञान पूर्वक 'अभिस्र्वरन्ति' बाह्य विज्ञानका रखने के लिये आत्माके सम्मुख जातो है । उस शरीरमें रहता हुआ 'विश्वस्य भुवनस्य इन:' सब शरीररूप भुवनका ईश्वर 'गोपा' सब इन्द्रियोंका रक्षक 'धीरः' बुद्धिमान् 'स:' वह 'अत्र' इस देहमें बुद्धिके अधि देवता रूपसे तैजस नाम वाला 'पाकम्' पक्वबुद्धि 'माम्' मुझको अनुग्राह्य बुद्धिसे 'आविवेश' प्रवेश करे। [उसीके अनुग्रहसे इस जीवको यथार्थ ज्ञान होता है उसीको प्रार्थना है।]” नि० अ०—जिस आदित्यमण्डलमें सुपर्णा नाम सुन्दर पतन करने वाले आदित्यके रश्मि अमृत नाम उदकके भागको आलस्य

६० ३ अ० २ पा० ६ खं० । रहित अथवा विज्ञानसे तपाते हैं अथवा सम्मुख जाते हैं। सब भूतों या प्राणियोंको रक्षा करने वाला आदित्य वह मुझे 'धीरः पाकमत्राविवेश' इति। 'धीर' नाम धीमान् धारणा बुद्धिवाला, 'पाक' नाम पकाने योग्यका है। उत्तम पकी हुई प्रज्ञान बुद्धिवाला, आदित्य (सूर्य) यह उपनिषद् विद्या है। यह देवता परक व्याख्या है। अब अध्यात्म नाम आत्म विषयक व्याख्या है। जिस (शरीर) में सुपर्ण नाम सुन्दर-गमन करने वाले इन्द्रिय, अमृत या अमरज्ञानके भागको (लेकर) आलस्यसे रहित विज्ञान पूर्वक भोक्ता पुरुषको विषयके ज्ञान द्वारा दुःखित करते हैं। अथवा बाह्य विज्ञानको स्थापन करनेके अर्थ आत्माके प्रति जाते हैं। सब इन्द्रियोंका ईश्वर रक्षक वह तैजस आत्मा "धीरः पाकमत्राविवेश" 'धीर' नाम 'धी' धारणा वालो बुद्धिवाला, 'पाक' नाम पकाने योग्य होता है, या विशेष पकी हुई बुद्धिवाला आत्मा। इस प्रकार आत्म पक्षको कहता है ॥ ६ ॥ व्याख्या । "यत्रा सुपर्णा" यह मन्त्र 'इम' शब्दको ईश्वरवाचकता दिखाने- के लिये दिया गया है। अधिदैवत या आदित्य पक्षमे सब भुवनोका ईश्वर और अध्यात्म पक्षमें सब इन्द्रियोंका ईश्वर कहा गया है। [अधिदैवत-] जिस मन्त्र या प्रकरणमें देवताके अधिकार या प्राधान्यसे अर्थ कहा जावे वह अधिदैवत है। जैसे उक्त "यत्रा सुपर्णा" मन्त्रमे सूर्य देवताके अभिप्रायसे आदित्यमण्डल रश्मिएँ या किरणें, उनका रसको ले जाकर पृथ्वीको तपाना आदि अर्थ कल्पित किया है। ऐसे ही अन्य मन्त्रोंमें जिस देवतामें मन्त्र लगाना होता है, उसीके अनुरूप सब शब्दोंके अर्थ कर लिये जाते हैं।

६२ ३ अ० ३ पा० १ ख० । तृतीयाध्यायस्य- तृतीयः पादः । ( खण्ड १ ) अथ निघण्टौ तृतीयोऽध्यायः । [ निघ० ] उरु ( १ ) । तुवि ( २ ) । पुरु ( ३ ) । भूरि ( ४ ) । शश्वत् ( ५ ) । विश्वम् ( ६ ) । पपी- यांसा ( ७ ) । व्यानशिः ( ८ ) । शतम् ( ९ ) । सहस्रम् ( १० ) । सलिलम् ( ११ ) । कुवित् ( १२ ) । इति द्वादश बहुनामानि ॥ १ ॥ [ निघ० ] ह्रसन् ( १ ) । ह्रस्वः ( २ ) । नि- घृष्वः ( ३ ) । माथुकः ( ४ ) । प्रतिष्ठा ( ५ ) । कृधु ( ६ ) । वभ्रुकः ( ७ ) । दभ्रम् ( ८ ) । अर्भकः ( ९ ) । क्षुल्लकः ( १० ) । अल्पः ( ११ ) । इत्येकादश ह्रस्वनामानि ॥ २ ॥ [ निघ० ] महत् ( १ ) । ब्रह्मः ( २ ) । ऋष्वः ( ३ ) । बृहत् ( ४ ) । उक्षितः ( ५ ) । तवसः ( ६ ) । तविषः ( ७ ) । महिषः ( ८ ) । ऋष्वः ( ९ ) ।

ऋभुक्षाः (१०) । उक्षाः (११) । विहायाः (१२) । यह्वः (१३) । ववक्षियः (१४) । विवक्षसे (१५) । ऋम्भृणः (१६) । माहितः (१७) । गभीरः (१८) । ककुहः (१८) । रभसः (२०) । ब्राधन् (२१) । विरप्शी (२२) । अद्भुतम् (२३) । वंहिष्ठः (२४) । बर्हिषत् (२५) । इति पञ्चविंशतिर्महन्नामानि ॥३॥ [निघ०-] गयः (१) । कृदरः (२) । नर्तः (३) । हर्म्यम् (४) । अस्तम् (५) । पस्त्यम् (६) । दुरोणे (७) । नीलयम् (८) । दुर्य्याः (६) खसराणि (१०) । अमा (११) । दमे (१२) । कृत्तिः (१३) । योनिः (१४) । सद्म (१५) । शरणम् (१६) । वरूथम् (१७) । छर्दिः (१८) । छदि (१९) । छाया (२०) । शर्म (२१) । अञ्म (२२) । इति द्वाविंशतिर्गृह- नामानि ॥ ४ ॥ [निघ०-] इरज्यति (१) । विधेम (२) । सपयति (३) । नमस्यति (४) । दुवस्यति (१५) । ऋप्नोति (६) । ऋशद्धि (७) । ऋच्छति (८) । सपति (६) । विवासति (१०) । इति दश परि- चरणकर्माणः ॥ ५ ॥