भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 361, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 361

हिन्दी निरुक्त । ५३ हो जाता है । उपमानमें खली और उपमेयमें संग्राम । 'खले' पदके आगे 'न' पद उपमा वाचक 'यथा' के अर्थमें है । वैकुण्ठका अभिमान । मन्त्रमें वेकुण्ठने जो अभिमान किया है । वह इन्द्र पुत्र होनेके कारणसे है । पुत्र पर पिताका अविकल स्वभाव आना प्राकृतिक है । इसी कारण हिन्दुओंमें कुलीनताका विशेष आदर है ॥ ४ ॥ सङ्कृतियां—क्योंकि संग्राममें परस्परको योध्या व्याप्त करते हैं, इस कारण संग्राम नामोंसे आगे व्याप्ति अर्थ वाले धातु कहे । क्योंकि संग्राममें पहले परस्परको व्यापन करते हैं, और फिर मारते हैं, इससे व्याक्तिकर्म धातुओंके अनन्तर वधकर्म धातु कहे गये ॥ ४ ॥ ( ख० ५ ) [ निघ० ] विद्युत् ( १ )। नेमिः ( २ )। हेतिः ( ३ )। नमः ( ४ )। पविः ( ५ )। सृकः ( ६ )। त्वकः ( ७ )। वधः ( ८ )। वज्रः ( ६ )। अर्कः ( १० )। कुत्सः ( ११ )। कुलिशः ( १२ )। तुजः ( १३ )। तिग्मम् ( १४ )। मेनिः ( १५ )। स्वधितिः ( १६ )। सायकः ( १७ )। परशुः ( १८ )। इति अष्टादश वज्रनामानि ॥ २० ॥ [ निघ० ] इरज्यति ( १ )। पत्यते ( २ )। क्षयति ( ३ )। राजति ( ४ )। इति चत्वारः ऐश्वर्यकर्माणः ॥ २१ ॥

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