निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२ ३ अ० २ पा० ४ खं० । धान्योंको जैसे, बहु कठोर शत्रु ओंको प्रतिघात करता हूं। 'खल' यह संग्रामका नाम है। भ्रंशार्थक 'खल' (भ्वा० प०) धातुसे है। [क्योंकि उसमें योद्धा गिरते हैं।] अथवा हिंसार्थक 'स्खल' (भ्वा० प०) धातुसे। [क्योंकि—इसमें योद्धा परस्परसे हिंसा किये जाते हैं।] यह भी दूसरा (धान्य) खल इसी (अर्थ) से है। [क्योंकि उसमें भी धान्य चूर्ण हो हो कर गिरते हैं। अथवा हिंसा किये जाते हैं।] [अथवा] धान्योंसे समास्कन्न या बिखरा हुआ होता है, इससे 'खल' है। [४र्थ पाद् ] “किं मा निन्दन्ति शत्रवोऽनिन्द्राः!” अर्थात् अनिन्द्र शत्रु मुझे क्या निन्दा कर सकते हैं। [अनिन्द्र क्या?] जो इन्द्रको नहीं जानते हैं। अथवा क्योंकि मैं इन्द्र हूं, अतः और सब अनिन्द्र हैं। व्याप्ति अर्थ वाले अनन्तर दश धातु हैं। उनमें दो नाम हैं। (१) 'आक्षाण' अशन या व्याप्त करने वाला। (२) 'आपान' व्याप्त होने वाला। अगले वध अर्थमें तेतीस धातु हैं। उनमें 'वियात' यह नाम है। [अर्थ] अथवा जो शत्रु ओंको नाना प्रकारसे कष्ट या यातना देता है। अथवा स्रोताओंसे जो 'वियात्यः' इस प्रकार कहा जाता है। ['आखण्डल' यह भी नाम ही है।] [निगम] “आखण्डल प्रहूयसे।” [ऋ० सं० ६, १, २४, २] अर्थात् हे आखण्डल ! इन्द्र ! तू आदरसे बुलाया जाता है। 'आखण्डल' शत्रुओं या मेघोंका आखण्डयिता खण्डन करने वाला। 'तडित्' यह अन्तिक या समीप अर्थमें संसर्ग रखने वाला है। 'ताडयति' ताडन करता है, इस कर्तृ वाच्यसे है ॥ ४॥ व्याख्या ! "अभोवम्" मन्त्र 'खल' शब्दकी व्याख्याके लिये दिया गया है। इसमें इसके संग्राम और खली दोनों अर्थोंका निर्वाह उत्तम प्रकारसे