भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 359

( नि० अ० ) मैं एक इस एक जगत्को तिरस्कार करता हूं । शत्रु ओंको तिरस्कार करता हुआ दो को ( भी ) तिरस्कार करता हूं । क्या मेरा तीन कर सकते हैं ? [ एक पद निरुक्त ] 'एक' इत या प्राप्त संख्या । [ दो आदि अन्य संख्याओंमें भी गई हुई रहती है । ] 'द्वि' अधिक फैली हुई संख्या । [ एक की अपेक्षासे । ] 'त्रि' अधिकसे अधिक तैरो हुई संख्या । [ दो की अपेक्षा । ] 'चतुर' बहुत चली हुई संख्या [ तीनकी अपेक्षा । ] 'अष्ट' व्याप्ति अर्थमें 'अश्' ( स्वा० आ० ) धातुसे है । [ क्योंकि वे सातको व्यापन करके रहते हैं ] 'नव' यह संख्या 'न वननीय' या वाञ्छनीय नहीं है । [ क्योंकि-नव ( ६ ) संख्या वाली तिथि नवमीमें कोई शुभ कर्म नहीं होता । ] 'दश' यह संख्या दस्ता या सब संख्याओं- का अन्त करने वाली है । अथवा दृष्टार्थ होनेसे 'दश' है । [ क्योंकि-एकादश द्वादश आदि संख्याओंके ऊपर फिर फिर देखी जाती है । ] 'विंशति' दो वार दशसे । 'शत' दश वार दशसे । 'सहस्र' क्यों ? सहस् नाम बलका है, सहस् वाला होनेसे 'सहस्र' है । [ क्योंकि दुर्बलोंका भी सहस्र बलवान् ही होता है । ] 'अयुत' 'नियुत' 'प्रयुत' उस उसको दश दश वार अभ्यास करनेसे होते हैं । [ अर्थात् सहस्र दश वार अभ्यास किया गया 'अयुत', अयुत दश वार अभ्यस्त 'नियुत', और नियुत दश वार अभ्यस्त प्रयुत होता है । ] 'अर्बुद' मेघ है । [ मेघ सादृश्यसे है । ] 'अम्बु' क्यों ? अरण या चलन करता है । उस ( जल ) को देने वाला 'अम्बुद' । [ अर्थात् अम्बुदसे 'अर्बुद' होता है । ] अथवा अम्बुमान् भान होता है । अथवा अम्बुवाला होता है । वह ( मेघ ) जिस प्रकार जलको बरसता हुआ महान् ( बड़ा ) बहु ( बहुत ) होता है, उसके समान बहु द्रव्य 'अर्बुद' कहाता है । [ ३य पाद ] "खले न पर्षान् प्रतिहन्मि भूरि।" अर्थात् खल (खाता) में