निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० ३ अ० २ पा० ४ खं० ।
न विदुः । 'इन्द्रो हि अहम् अस्मि, अनिन्द्रा इतरे-इति वा। व्याप्तिकर्माणः उत्तरे धातवो दश । तत्र द्वे नामनौ । 'आशानः' आशु वानः । 'आपानः' आप्नु- वानः । वधकर्माणः उत्तरे धातवस्त्रयस्त्रिंशत् । तत्र 'वियातः' इत्येतद् वियातयत इति वा । वियातयेति वा । "आखण्डल प्रहूयसे ।" आखण्डयितः । 'तडित्' इति अन्तिका-वधयोः । संसृष्ट-कर्म ताडयति इति सतः ॥ ४ ॥ अर्थ । "अभोदम्" इस मन्त्रका वैकुण्ठ इन्द्र पुत्र ऋषि । जगती छन्दः । दश रात्रके नवम अहन् ( दिन ) में निष्केवल्यमें शस्त्र ।" 'आध्या- त्मिक मन्त्र ।" मन्त्रार्थ-मैं अकेला ही शत्रुओंको दबाता हुआ इस जगत्का अभिभव ( तिरस्कार ) या आधिपत्य करता हूं । किस प्रकार ? यदि एक शत्रु आता है, तो अकेला हो उसे हरा देता हूं । दोओंको भी आये हुओको अकेला ही हरा देता हूं । और क्या ? तीन भी एक साथ आए हुए मेरे अकेलेका क्या कर सकते हैं ? [ किन्तु कुछ नहीं-यह अभिप्राय है । ] बहुत क्या ? खल या खलीमें जिस प्रकार कर्षक लोग बहुत सञ्चित धान्योंको भी सहजमें गाह डालते हैं, उसी प्रकार संग्राममें मैं निष्ठुर ( कठोर ) शत्रुओंको भी क्षण ही में मार देता हूं । मेरा ऐसा प्रभाव होने पर भी इन्द्र रहित या इन्द्र भिन्न या इन्द्रको न जानने वाले शत्रु मेरी क्या निन्दा कर सकते हैं ? अर्थात् मैं निन्दाके योग्य नहीं बल्कि स्तुति करने योग्य हूं ॥