निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ५६ वह मन्त्र जिसमें 'इन' यह ईश्वरका नाम है—"यत्रा सुपर्णा" इत्यादि । इस मन्त्रका दीर्घतमाः ऋषि । त्रिष्टुप् छन्दः । विश्वे- देवाः देवता । महाव्रतमें तृतीय सवनमें वैश्वदेव शस्त्रमें शस्त्र है । मन्त्रार्थ—[देवता पक्ष-] 'यत्र' जिस आदित्य मण्डलमें स्थित हुए हुए 'सुपर्णा' जो अन्धकारको दूर करनेके लिये गिरते हैं अथवा सुन्दर होते हुए गिरते हैं 'अमृत' अमर जलके 'भाग' भजन (सेवन) योग्य अंशको पृथिवी लोकसे लेकर 'विदथा' अपने अधिकारके ज्ञान पूर्वक 'अनिमिष' आलस्य रहित या आदर-युक्त आदित्य- रश्मि 'अभिस्र्वरन्ति' सम्मुख भावसे आदित्य मण्डलको जाते हैं । या लोकको तपाते हैं । उस आदित्य मण्डलमे स्थित हुआ हुआ सब लोकोंका 'इन' ईश्वर 'गोपा' रक्षा करने वाला 'धीर' धीमान् स्वच्छबुद्धि वाला वह आदित्य अनुग्रहसे' अत्र' इस आदित्य मण्ड- लमें मा' 'पाकम्' मुझ अपक्वबुद्धिको 'आविवेश' प्रवेश करे । [आत्मपक्ष-] 'यत्र' जिस शरीरमें 'सुपर्णा' अपने अपने काले बिन्दु आदि स्थानोंमें स्थित हुयी हुयी चक्षु आदि इन्द्रियें 'अमृतस्य' अमर धर्म युक्त ज्ञानको 'भागम्' अपने अपने ग्राह्य रूप आदि विषय रूप रसको लेकर 'अनिमेषम्' आलस्य रहित या आदर युक्त 'विदथा' विषय विज्ञान पूर्वक 'अभिस्र्वरन्ति' बाह्य विज्ञानका रखने के लिये आत्माके सम्मुख जातो है । उस शरीरमें रहता हुआ 'विश्वस्य भुवनस्य इन:' सब शरीररूप भुवनका ईश्वर 'गोपा' सब इन्द्रियोंका रक्षक 'धीरः' बुद्धिमान् 'स:' वह 'अत्र' इस देहमें बुद्धिके अधि देवता रूपसे तैजस नाम वाला 'पाकम्' पक्वबुद्धि 'माम्' मुझको अनुग्राह्य बुद्धिसे 'आविवेश' प्रवेश करे। [उसीके अनुग्रहसे इस जीवको यथार्थ ज्ञान होता है उसीको प्रार्थना है।]” नि० अ०—जिस आदित्यमण्डलमें सुपर्णा नाम सुन्दर पतन करने वाले आदित्यके रश्मि अमृत नाम उदकके भागको आलस्य