निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० ३ अ० २ पा० ६ खं० । रहित अथवा विज्ञानसे तपाते हैं अथवा सम्मुख जाते हैं। सब भूतों या प्राणियोंको रक्षा करने वाला आदित्य वह मुझे 'धीरः पाकमत्राविवेश' इति। 'धीर' नाम धीमान् धारणा बुद्धिवाला, 'पाक' नाम पकाने योग्यका है। उत्तम पकी हुई प्रज्ञान बुद्धिवाला, आदित्य (सूर्य) यह उपनिषद् विद्या है। यह देवता परक व्याख्या है। अब अध्यात्म नाम आत्म विषयक व्याख्या है। जिस (शरीर) में सुपर्ण नाम सुन्दर-गमन करने वाले इन्द्रिय, अमृत या अमरज्ञानके भागको (लेकर) आलस्यसे रहित विज्ञान पूर्वक भोक्ता पुरुषको विषयके ज्ञान द्वारा दुःखित करते हैं। अथवा बाह्य विज्ञानको स्थापन करनेके अर्थ आत्माके प्रति जाते हैं। सब इन्द्रियोंका ईश्वर रक्षक वह तैजस आत्मा "धीरः पाकमत्राविवेश" 'धीर' नाम 'धी' धारणा वालो बुद्धिवाला, 'पाक' नाम पकाने योग्य होता है, या विशेष पकी हुई बुद्धिवाला आत्मा। इस प्रकार आत्म पक्षको कहता है ॥ ६ ॥ व्याख्या । "यत्रा सुपर्णा" यह मन्त्र 'इम' शब्दको ईश्वरवाचकता दिखाने- के लिये दिया गया है। अधिदैवत या आदित्य पक्षमे सब भुवनोका ईश्वर और अध्यात्म पक्षमें सब इन्द्रियोंका ईश्वर कहा गया है। [अधिदैवत-] जिस मन्त्र या प्रकरणमें देवताके अधिकार या प्राधान्यसे अर्थ कहा जावे वह अधिदैवत है। जैसे उक्त "यत्रा सुपर्णा" मन्त्रमे सूर्य देवताके अभिप्रायसे आदित्यमण्डल रश्मिएँ या किरणें, उनका रसको ले जाकर पृथ्वीको तपाना आदि अर्थ कल्पित किया है। ऐसे ही अन्य मन्त्रोंमें जिस देवतामें मन्त्र लगाना होता है, उसीके अनुरूप सब शब्दोंके अर्थ कर लिये जाते हैं।