निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ ३ अ० २ पा० ३ ख० । क्षिप्रनामोंके अनन्तर ग्यारह (११) अन्तिक (समीप) के नाम हैं। 'अन्तिक' किस अर्थ से है ? [क्योंकि] वह लाया हुआ होता है। अन्तिक नामोंके अनन्तर छियालीस (४६) संग्रामके नाम हैं। 'संग्राम' किस अर्थ से है। सङ्गमन या दोओंके मिलनेसे। अथवा उसमें एक दूसरा अपने शत्रुके प्रति संगरण या शब्द करता है, या उक्ति प्रत्युक्ति करता है। अथवा उसमें दो समूह परस्परके जोतने की इच्छासे मिलते हैं। तहाँ 'खल' इस नामके निगम हैं ॥ ३ ॥ व्याख्या । निगम का प्रयोजन। “दशावनिभ्यः” यह निगम इसलिये दिया गया कि अङ्गुलि नामोंमें से कई नाम और और अर्थोंमें भी आये हुए हैं। जैसे कि-नदी नामोंमें (अध्याय १ खण्ड १३) 'अवनि' शब्द और रश्मि नामोंमें (अ० १ खं० ५) 'अभीशु' शब्द, इस कारण उनकी सन्दिग्धता मिटाई जावे अथवा अङ्गुलि अर्थको निश्चय कराया जावे। मन्त्रमें अवनि आदि पाँचों पदोंके साथ 'दश' संख्यावाचक शब्दके विशेषण होने, उनके अर्थोंमें जो क्रियाएँ हैं, उनसे तथा लोढ़िके सम्बन्धसे ये पाँचो शब्द यहाँ पर अङ्गुलिके ही नाम हो सकते हैं, नदी या रश्मिके नहीं। अनेक अङ्गुलि नामोंको एक ही स्थानमें जो मन्त्रमें दे रहा हैं, वह भिन्न भिन्न शब्दोंके द्वारा अङ्गुलियोमे होनेवाली भिन्न भिन्न क्रियाओंके जतानेके लिये है। जैसे कर्मकी रक्षा, कर्मका प्रकाश, कर्मकी योजना, कर्मको व्याप्त करना आदि । ग्रावस्तुतिमें अनेक अङ्गुलि नामोंका एक साथ उपयोग यह है कि-अनेक क्रियावाली अङ्गुलियोंसे ये ग्रहण किये जाते हैं, इससे उनकी स्तुति करो।