निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त। ४७ सङ्गतार्थ--क्योंकि-बाहु सहित अङ्गुलि सहित पुरुषकी व्याख्या हो चुकी है, इससे अब पुरुषको प्रथम कामहीने प्रवेश किया इस कारण कान्ति या काम अर्थ वाले धातु कहे गये हैं। अथवा कान्ति नाम सौन्दर्यका है। क्योंकि-जो वस्तु असुन्दर होती है, वह अङ्गुलियोंसे ही सुन्दर की जाती है, इस कारण अङ्गुलि नामोंके अनन्तर कान्ति अर्थ वाले धातु कहे गये हैं। सब पदार्थोंकी अपेक्षा अन्न ही कान्त या प्रिय होता है, इसलिये कान्त्यर्थक धातुओंके अनन्तर अन्न नाम हैं। अन्न ही खाया जाता है, इससे अन्न नामोंके अनन्तर अत्तिकर्म धातु है। क्योंकि-जो ही खाते हैं, बलवान् होते हैं, इसलिये अत्ति कर्म धातुओंके अनन्तर बलके नाम हैं। क्योंकि-जो बलवान् होते है वे ही धनको प्राप्त होते हैं, इस कारण बल नामोंके अनन्तर धनके नाम हैं। सब धनोंमें गोधन ही उत्तम धन है, इस कारण धन नामोंके अनन्तर गो नाम है। धन या गोके अर्थ ही क्रोध होता है, इसलिये गो नामोंके अनन्तर क्रोधार्थ धातु हैं। क्रोध अर्थ के सम्बन्धसे ही क्रोध नाम कहे गये हैं। क्रुद्ध होकर ही सुतराम् गमन करते हैं, इससे क्रोध नामोंके अनन्तर गत्यर्थक धातु हैं। गमन ही से शीघ्र कहा जाता है, इससे गत्यर्थक धातुओंके अनन्तर क्षिप्र ( शीघ्र ) नाम हैं। क्योंकि-शीघ्र चलने वाले ही, अपने वाञ्छित स्थानके निकट होते हैं, इससे शीघ्र नामोंके अनन्तर अन्तिक नाम हैं। समीपमें हुए हुए योधोंका ही संग्राम होता है, इसलिये अन्तिक नामोंके अनन्तर संग्रामके नाम हैं।