निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 365, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ५९ क्योंकि उसके सखा इन्द्रने रसोंको शोषण करने वाले असुर या मेघको मारा है । वज्र नामोंके अनन्तर चार (४) ऐश्वर्य अर्थवाले धातु हैं। ऐश्वर्य कर्म धातुओंके अनन्तर चार (४) ईश्वरके नाम हैं। उन ईश्वरके नामोंमें 'इन' यह क्यों ? ऐश्वर्यसे सनित या व्याप्त है। अथवा इससे ऐश्वर्य व्याप्त है ॥ ५ ॥ व्याख्या । इस खण्डमें 'तडित्' इस सन्दिग्ध पदकी "त्वया वयम्" उदाहरणसे व्याख्या दिखाई कि मन्त्रोंमें यह पद समीप अर्थमें आता है । शाकपूणि आचार्य विद्युत्का नाम भी मानते हैं। किन्तु आचार्यने दूसरे मन्त्रसे भी पूर्व अर्थको ही पुष्ट किया है, जो यहाँ प्रकरणके अनुरूप है । वज्र नामोंमें 'कुत्स' यह सन्दिग्ध पद है। क्योंकि वज्र और ऋषि दोनों अर्थोंमें आता है। ऋषि अर्थका पक्ष औपमन्यव आचार्य लेता है। पर आचार्य पुरा पक्षमें भी इस शब्दके धातुका वध अर्थ ही मानते हैं, जिसे उन्होंने उनके उपास्य देव इन्द्रके द्वारा सिद्ध किया है । "त्वया वयम्" मन्त्रमें गृत्समद ऋषिने अपने ब्रह्मणस्पति देवसे अरातियों या शत्रुओंके नाश करनेकी प्रार्थना की है यहाँ भगवद्दुर्गाचार्यने शत्रुओंके दो भेद बताए हैं । (१) दुःखसंनाश्य जिनका दुःखसे नाश हो सकता है। (२) सुख संनाश्य जिनका सुखसे नाश हो सकता है। पहले भेदमें वे शत्रु हैं, जो यह बुद्धि रखते हैं कि 'हमे' इनके लिये देना नहीं चाहिये। और दूसरे वे हैं, जो औरोंको देते हुओंको रोकें ॥ ५ ॥