निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 352, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ें४४ ३ अ० २ पा० ३ खं० । संग्रामनामानि उत्तराणि षट्चत्वारिंशत् । 'सङ्ग्रामः' कस्मात् ? सङ्गमनाद्वा । संगरणाद्वा । संगतौ ग्रामौ-इति वा । तत्र 'खलः' इत्येतस्य निगमा भवन्ति ॥ ३ ॥ अर्थ । “दशाववनिभ्यः, इति त्रिष्टुप् छन्दः । अर्बुदः कद्रूपुत्रऋषिः । ग्रावस्तुतो विनियोगः ।” मन्त्रार्थ—हे ऋत्विजो ! तुम इन पाषाणों (लोढ़ों) के लिये स्तुतियोंका उच्चारण करो, दश अङ्गुलियोंसे उपचार या ग्रहण किये जाते हैं, जो दश अङ्गुलियोंसे युक्त होकर पेषण (पीसना) आदि कर्मको वहन या धारण करते हैं । जो कभी जीर्ण नहीं होते, और जो दश अङ्गुलियोंको पीड़न करने वाले हैं । [इस मन्त्रमें बाईस (२२) अङ्गुलि नामोमेसे 'अवनि' 'कक्ष्या' 'योक्त' 'योजन' और 'अमीशु' ये पाँच नाम एक साथ तथा एकही स्थानमें आये हुए हैं। अतः आरम्भके पाँच पदोंका एकही अर्थ है। एवम् यह अकेलाही मन्त्र अङ्गुलिके अनेक नामोंका निगम बन जाता है, यह इसका एक वैचित्र्य है।] नि० अ०--'अवनि' अङ्गुलि होती हैं । [क्योंकि-] ये कर्मों- को अवन या रक्षण करती हैं। 'कक्ष्या' [क्यों ?-] कर्मोंको प्रकाश करती हैं। 'योक्त' पद 'योजन' इस पदसेही व्याख्यान किया गया है। [और योजन पद स्वयम् प्रसिद्धार्थ है ।] 'अभीशु'[क्यों?] कर्मोंको आभिमुख्य (संमुखता) से व्यापन करतो हैं। [४र्थ पाद ] “दश धुरो दश युक्ता वहद्म्यः”। ‘धूः' 'धुर्' शब्द वध अर्थमें