निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २८८ ) १० अ० १ पा० ५ खं० तस्य एषा अपरा भवति ॥४॥ अर्थ:-“नीचीनबारम्०” इसका अत्रि ऋषि है । ‘वरुणः’ वरुण(मेघपू)मेघकी‘नीचीनबारम्’(नीचीनद्वारम्) (व्यक् अञ्चयते द्वार यस्य सः नीचीनद्वारः) अधोमुख (करके)— मेघका मुख नीचे को करके ‘कवन्धम्’ (उदकम्) जल को ‘प्रससर्ज’ (प्रसृजति) रचता है = बरसाता है। ‘रोदसी’ (द्यावा- पृथिव्यौ) ‘अन्तरिक्षं’ (च) द्युलोक—पृथिवी लोकों को और अन्तरिक्ष को (महत्वेन) अपने बड़े पने से (प्रसृजति) विशेष रूप से रचता है । ‘तेन’ तिस कारण से ‘विश्वस्य’ (सर्वस्य) सारे (भुवनस्य) भुवन(लोक) का ‘राजा’ है । उसीके अनुग्रह के अर्थ ‘वृष्टिः’ वर्षा ‘भूम’ (भूमिम्) सारी पृथिवी को ‘यवम् न’ किंचित् वस्तु के समान ‘व्युनत्ति’ (क्लेदयति) गीला करती है भिगोदेती है । (‘वह वरुण देव हमारे लिये ऐसा वाञ्छित करें’) यह आशीः जोड़ लेना चाहिये ।) ॥ ‘कवन्ध’ क्या ? मेघ । क्यों ‘कवन’ उदक = जल होताहै; वह उसमें धारण कियाजाता है ! जल भी ‘कबन्ध’ कहा जाता है । क्यों ? ‘वन्ध’ धातु (स्वा०प०) अनिभृतत्व = चञ्चल = पने में है । ‘कं’ सुखरूप ! और ‘वन्ध’ चञ्चल = चपल होने से यह ‘कबन्ध’ है “तस्य०” उस वरुण की यह दूसरी ऋचा है। यद्यपि उक्त ऋचामें जो वरुण का वर्ष कर्म दिखाया है, वह सूर्य में भी संभव है, इस से यह लक्षण मध्यम वरुण का असंदिग्ध नहीं होता, अतः अगली ऋचा दी जाती है, जिसमें ‘मध्यम’ शब्द से ही उसे मध्यम कहा गया है- ॥ ४ ॥