निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] हिन्दी निरुक्त ( २८७ ) १० अ० १ पा० ४ खं०
है-इन्द्र ही इस ऋचा में प्रधान है और 'वायु' शब्द उसी का विशेषण है । दूसरा मत यह है-,कि-दोनों ( इन्द्र और वायु ) ही इस ऋचा में प्रधान देवता हैं । इन्द्र स्वतन्त्र है और वायु स्वतन्त्र है। 'वायु' शब्द इन्द्र का विशेषण नहीं। यह मत देवता भेदवादियों का है जो लोग ( याज्ञिक ) एक २ लोक में भी अनेक देवता मानते हैं वे ऐसा कहते हैं । किंतु नैरुक्त इसको ठीक नहीं समझते, कारण इस ऋचा का निष्केवल्य में विनियोग है, वहाँ वायु का सम्बन्ध नहीं (भग०दु०) ॥ 'वरुण' ( २ ) यह किस धातु का है ? वृणोति' (ढांप- लेता है ) इस कर्तृ वाच्य ( स्वा० उ० ) धातु का है । क्योंकि वह मेघजाल से सब आकाश को ढांपलेता है । “तस्य०” उसकी यह ऋचा है ॥३॥ ( खं० ४ ) निरु०— “ नीचीनवारं वरुणः कवन्धं प्रससर्ज रोदसी अन्तरिक्षम् । तेन विश्वस्य भुवनस्य राजा यवन्न वृष्टिव्युंनत्ति भूम ॥” [ऋ० सं० ४,४,३,३]॥ नीचीनद्वारं वरुणः कवन्धं मेघम् । ' कवनम् ' उदकं भवति, तद् अस्मिन् धीयते । उदकमपि 'कवन्धम्' उच्यते । 'वन्धिः' अनिभृ- तत्वे । ' कम्- अनिभृतं च ' । प्रसृजति द्यावा- पृथिव्यौ च अन्तरिक्षं च महत्त्वेन । तेन सर्वस्य भुवनस्य राजा । यवमिव वृष्टिव्युंनत्ति भूमिम् ।