निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवायोश्च अस्य भक्षो यथा न विदस्येत्-इति ॥ इन्द्रप्रधाना-इत्येके । नैघण्टुकं वायुकर्म । उभयप्रधाना-इत्यपरम् ॥ 'वरुणः' वृणोति -इति सतः । तस्य-एषा भवति- ॥ ३ ॥ अर्थः- “आसस्त्राणासः०” इस ऋचा का भरद्वाज ऋषि है । महाव्रत महदुक्थ में शस्त्र है, उत्तर पक्ष में । ‘रथ्योः’ ( रथ्याः ) रथ में जुड़ने वाले, 'सुचक्रे' सुन्दर पहियों वाले रथपे ‘आसस्राणासः’ ( आससृवांसः ) नित्य ही हमारे यज्ञ में आने के अर्थ आसर्पण करने वाले तेज चलने वाले'ऋज्यन्तः (ऋजुगामिनः) सीधे चलने वाले ‘अश्वा ( रथस्य वोढारः ) रथके खेंचने वाले घोड़े ‘शवसानम्’ [अभि- बलायमानम् ] अपने को अधिक बलवाला मानते हुये 'इन्द्रम्' इन्द्र को ‘अभि—वहेयुः' हमारे यज्ञके प्रति लावें जिस प्रकार कि—'नूचित्’(नवं च पुराणं च) नया और पुराना ‘वायोः’ वायु = इन्द्रका ‘अमृतम्’ सोमरूप ‘श्रवः’ अन्न ‘नू’ ‘विदस्येत्’ न सूखै-न बिगड़े--ऐसे गुणवाले घोड़े रथमें बैठे हुये इन्द्र को बहुत शीघ्र लावें जिससे कि- नया पुराना सोम बिगड़े नहीं (यह हम आशा करते हैं) । इस प्रकार इस मन्त्र में इन्द्र के विशेषण के रूप में आया हुआ 'वायु' शब्द इन्द्रका ही वाचक हो सकता है । ‘श्रवः’ यह अन्न का नाम है । क्योंकि-वह सब स्थान में श्रवण किया जाता है । कोई आचार्य मानते हैं कि - 'यह ऋचा इन्द्रप्रधाना