निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २८५ ) १० अ० १ पा० ३ खं० हे 'वायो ' वायु देव ! 'दर्शंत !' ( दर्शनीय !) दर्शन करने योग्य ! 'आयाहि' आ । 'इमे' ये 'सोमाः' सोम 'अर- ङ्कृताः' [अलङ्कृताः] तेरे अर्थ सजाए हुए हैं । 'तेषाम्' उन सोमों के अपने भाग को 'पाहि' (पिव) पी । 'श्रुधि' (शृणु ) सुन-'हवम्' [ नः ह्वानम् ] हमारे आवाहन को । इस प्रकार मध्यम से किस अन्य देवको ऋषि कहता ? अतः 'वायु ' मध्यम लोक का इन्द्र देव ही है-'वायु' शब्द से इन्द्र का ही ग्रहण होसकता है । क्योंकि सोमके साथ विशेष सम्बन्ध इन्द्रका ही है। इससे 'वायु' शब्द से अन्य लोक के देवता की आपत्ति यहां नहीं होसकती । “तस्य०” उस इन्द्रवायु की यह दूसरी ऋचा है, जिसमें 'वायु' शब्द 'इन्द्र' पद के साथ विशेषण रूप में पढ़ा हुआ है— ॥ २ ॥ ( खं० ३ ) निरु०- “आसस्राणासः शवसान मच्छेन्द्रं सुचक्रे रथ्यासो अश्वाः। अभिश्रव ऋज्यन्तो वहेयु र्नूचिन्त्नु वायोरमृतं विदस्येत् ॥” [ ऋ० सं० ४, ७, ९, १ ] ॥ आससृवांसः अभिवलायमानम्-इन्द्रं कल्याण- चक्रेरथे योगाय रथ्याः अश्वाः रथस्य वोढारः ऋज्यन्तः ऋजुगामिनः अन्नम्-अभिवहेयुः नवं च पुराणं च ॥ 'श्रवः' इति अन्ननाम श्रूयते इति सतः ।