निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त ( २८५ ) १० अ० १ पा० ३ खं० हे 'वायो ' वायु देव ! 'दर्शंत !' ( दर्शनीय !) दर्शन करने योग्य ! 'आयाहि' आ । 'इमे' ये 'सोमाः' सोम 'अर- ङ्कृताः' [अलङ्कृताः] तेरे अर्थ सजाए हुए हैं । 'तेषाम्' उन सोमों के अपने भाग को 'पाहि' (पिव) पी । 'श्रुधि' (शृणु ) सुन-'हवम्' [ नः ह्वानम् ] हमारे आवाहन को । इस प्रकार मध्यम से किस अन्य देवको ऋषि कहता ? अतः 'वायु ' मध्यम लोक का इन्द्र देव ही है-'वायु' शब्द से इन्द्र का ही ग्रहण होसकता है । क्योंकि सोमके साथ विशेष सम्बन्ध इन्द्रका ही है। इससे 'वायु' शब्द से अन्य लोक के देवता की आपत्ति यहां नहीं होसकती । “तस्य०” उस इन्द्रवायु की यह दूसरी ऋचा है, जिसमें 'वायु' शब्द 'इन्द्र' पद के साथ विशेषण रूप में पढ़ा हुआ है— ॥ २ ॥ ( खं० ३ ) निरु०- “आसस्राणासः शवसान मच्छेन्द्रं सुचक्रे रथ्यासो अश्वाः। अभिश्रव ऋज्यन्तो वहेयु र्नूचिन्त्नु वायोरमृतं विदस्येत् ॥” [ ऋ० सं० ४, ७, ९, १ ] ॥ आससृवांसः अभिवलायमानम्-इन्द्रं कल्याण- चक्रेरथे योगाय रथ्याः अश्वाः रथस्य वोढारः ऋज्यन्तः ऋजुगामिनः अन्नम्-अभिवहेयुः नवं च पुराणं च ॥ 'श्रवः' इति अन्ननाम श्रूयते इति सतः ।
वायोश्च अस्य भक्षो यथा न विदस्येत्-इति ॥ इन्द्रप्रधाना-इत्येके । नैघण्टुकं वायुकर्म । उभयप्रधाना-इत्यपरम् ॥ 'वरुणः' वृणोति -इति सतः । तस्य-एषा भवति- ॥ ३ ॥ अर्थः- “आसस्त्राणासः०” इस ऋचा का भरद्वाज ऋषि है । महाव्रत महदुक्थ में शस्त्र है, उत्तर पक्ष में । ‘रथ्योः’ ( रथ्याः ) रथ में जुड़ने वाले, 'सुचक्रे' सुन्दर पहियों वाले रथपे ‘आसस्राणासः’ ( आससृवांसः ) नित्य ही हमारे यज्ञ में आने के अर्थ आसर्पण करने वाले तेज चलने वाले'ऋज्यन्तः (ऋजुगामिनः) सीधे चलने वाले ‘अश्वा ( रथस्य वोढारः ) रथके खेंचने वाले घोड़े ‘शवसानम्’ [अभि- बलायमानम् ] अपने को अधिक बलवाला मानते हुये 'इन्द्रम्' इन्द्र को ‘अभि—वहेयुः' हमारे यज्ञके प्रति लावें जिस प्रकार कि—'नूचित्’(नवं च पुराणं च) नया और पुराना ‘वायोः’ वायु = इन्द्रका ‘अमृतम्’ सोमरूप ‘श्रवः’ अन्न ‘नू’ ‘विदस्येत्’ न सूखै-न बिगड़े--ऐसे गुणवाले घोड़े रथमें बैठे हुये इन्द्र को बहुत शीघ्र लावें जिससे कि- नया पुराना सोम बिगड़े नहीं (यह हम आशा करते हैं) । इस प्रकार इस मन्त्र में इन्द्र के विशेषण के रूप में आया हुआ 'वायु' शब्द इन्द्रका ही वाचक हो सकता है । ‘श्रवः’ यह अन्न का नाम है । क्योंकि-वह सब स्थान में श्रवण किया जाता है । कोई आचार्य मानते हैं कि - 'यह ऋचा इन्द्रप्रधाना
[Header] हिन्दी निरुक्त ( २८७ ) १० अ० १ पा० ४ खं०
है-इन्द्र ही इस ऋचा में प्रधान है और 'वायु' शब्द उसी का विशेषण है । दूसरा मत यह है-,कि-दोनों ( इन्द्र और वायु ) ही इस ऋचा में प्रधान देवता हैं । इन्द्र स्वतन्त्र है और वायु स्वतन्त्र है। 'वायु' शब्द इन्द्र का विशेषण नहीं। यह मत देवता भेदवादियों का है जो लोग ( याज्ञिक ) एक २ लोक में भी अनेक देवता मानते हैं वे ऐसा कहते हैं । किंतु नैरुक्त इसको ठीक नहीं समझते, कारण इस ऋचा का निष्केवल्य में विनियोग है, वहाँ वायु का सम्बन्ध नहीं (भग०दु०) ॥ 'वरुण' ( २ ) यह किस धातु का है ? वृणोति' (ढांप- लेता है ) इस कर्तृ वाच्य ( स्वा० उ० ) धातु का है । क्योंकि वह मेघजाल से सब आकाश को ढांपलेता है । “तस्य०” उसकी यह ऋचा है ॥३॥ ( खं० ४ ) निरु०— “ नीचीनवारं वरुणः कवन्धं प्रससर्ज रोदसी अन्तरिक्षम् । तेन विश्वस्य भुवनस्य राजा यवन्न वृष्टिव्युंनत्ति भूम ॥” [ऋ० सं० ४,४,३,३]॥ नीचीनद्वारं वरुणः कवन्धं मेघम् । ' कवनम् ' उदकं भवति, तद् अस्मिन् धीयते । उदकमपि 'कवन्धम्' उच्यते । 'वन्धिः' अनिभृ- तत्वे । ' कम्- अनिभृतं च ' । प्रसृजति द्यावा- पृथिव्यौ च अन्तरिक्षं च महत्त्वेन । तेन सर्वस्य भुवनस्य राजा । यवमिव वृष्टिव्युंनत्ति भूमिम् ।
हिन्दी निरुक्त ( २८८ ) १० अ० १ पा० ५ खं० तस्य एषा अपरा भवति ॥४॥ अर्थ:-“नीचीनबारम्०” इसका अत्रि ऋषि है । ‘वरुणः’ वरुण(मेघपू)मेघकी‘नीचीनबारम्’(नीचीनद्वारम्) (व्यक् अञ्चयते द्वार यस्य सः नीचीनद्वारः) अधोमुख (करके)— मेघका मुख नीचे को करके ‘कवन्धम्’ (उदकम्) जल को ‘प्रससर्ज’ (प्रसृजति) रचता है = बरसाता है। ‘रोदसी’ (द्यावा- पृथिव्यौ) ‘अन्तरिक्षं’ (च) द्युलोक—पृथिवी लोकों को और अन्तरिक्ष को (महत्वेन) अपने बड़े पने से (प्रसृजति) विशेष रूप से रचता है । ‘तेन’ तिस कारण से ‘विश्वस्य’ (सर्वस्य) सारे (भुवनस्य) भुवन(लोक) का ‘राजा’ है । उसीके अनुग्रह के अर्थ ‘वृष्टिः’ वर्षा ‘भूम’ (भूमिम्) सारी पृथिवी को ‘यवम् न’ किंचित् वस्तु के समान ‘व्युनत्ति’ (क्लेदयति) गीला करती है भिगोदेती है । (‘वह वरुण देव हमारे लिये ऐसा वाञ्छित करें’) यह आशीः जोड़ लेना चाहिये ।) ॥ ‘कवन्ध’ क्या ? मेघ । क्यों ‘कवन’ उदक = जल होताहै; वह उसमें धारण कियाजाता है ! जल भी ‘कबन्ध’ कहा जाता है । क्यों ? ‘वन्ध’ धातु (स्वा०प०) अनिभृतत्व = चञ्चल = पने में है । ‘कं’ सुखरूप ! और ‘वन्ध’ चञ्चल = चपल होने से यह ‘कबन्ध’ है “तस्य०” उस वरुण की यह दूसरी ऋचा है। यद्यपि उक्त ऋचामें जो वरुण का वर्ष कर्म दिखाया है, वह सूर्य में भी संभव है, इस से यह लक्षण मध्यम वरुण का असंदिग्ध नहीं होता, अतः अगली ऋचा दी जाती है, जिसमें ‘मध्यम’ शब्द से ही उसे मध्यम कहा गया है- ॥ ४ ॥
हिन्दी निरुक्त ( २८६ ) १० अ० १पा० ५खंड ( खं० ५ ) निरु०-“तमूषुसमना गिरा पितॄणाञ्च मन्मभिः । नांभा कस्य प्रशस्तिभिर्यः सिन्धूनामुपोदये सप्त- स्वसास मध्यमो नभन्तामन्यकेसमे ॥ ” (ऋ०सं० ६, ३, २६, १) ॥ तं स्वभिष्टौमि समानया गिरा = गीत्या = स्तुत्या, पितॄणां च मननीयैः स्तोमैः, नाभाकस्य प्रशस्तिभिः । ऋषि 'र्नाभाको' बभूव, यः स्यन्दमानानाम्- आसाम्-अपाम्-उपोदये सप्तस्वसारम्-एनम्-आह वाग्भिः- 'सः मध्यमः'- इति निरुच्यते। अथ एष एव भवति । “ नभन्तामन्यके समे ” मा भूवन्नन्यके सर्वे- येनो द्विषन्ति दुर्धियः = पापाधियः = पापसंकल्पाः॥ ‘रुद्रः’ रौति- इति सतः । रोरूयमाणो द्रवति- इति वा । रोदयते र्वा । “ यदरुदत्तद् रुद्रस्य रुद्रत्वम्” इति काठकम् । “यदरोदीत् तद् रुद्रस्य रुद्रत्वम्”-इति हारिद्रविकम् ॥ तस्य एषा भवति ॥५॥ अर्थः- (अहम्) मैं ‘तम्’ उस वरुण को ‘समना’(समानया) उसके योग्य ‘गिरा’ ( गीत्या = स्तुत्या )स्तुति से ‘पितॄणां ’ च’ और पितरों के ‘मन्मभिः’ (मननीयैः स्तोमैः) मनन करने
हिन्दी निरुक्त ( २९० ) १० अ० १ पा० ५ खं० योग्य स्तोत्रों से 'नाभाकस्य' और नाभाक ऋषि की 'प्रशस्ति- भिः' प्रशंसाओं से = स्तोत्रों से 'ष्ठु' (अभिष्टौमि) सुन्दर अभिमुख भाव से स्तुति करता हूं, 'यः' जो नाभाक 'सिन्धू- नाम्' ( स्यन्दमानानाम् आसाम् अपाम् ) बहने वाले इन जलों के 'उपोदये' उदय काल में = वर्षाकाल में 'सप्तस्वसा' ( सप्तस्वसारम्-एनम्-आह ) इसे सात बहिनों वाला कहता है-अथवा आदि सात मध्यमा वाणियें इसकी बहिनें हैं ऐसा कहता है । 'सः' वह वरुण ' मध्यमः ' मध्यम है। [ इति निरुच्यते ] इस प्रकार इस मन्त्र में शब्द के द्वारा ही वरुण मध्यम कहा गया है । “नमन्ता मन्यके समे” ( माभूवन्नन्यके सर्वे, - ये नो द्विषन्ति दुर्धियः = पापधियः = पापसंकल्पाः ) अर्थात्- उस वरुण के अनुग्रह से वे सब न होवें जो दुष्ट बुद्धि वाले = पाप बुद्धि वाले = पाप संकल्प वाले हमें द्वेष करते हैं । 'रुद्र' (३) किस धातु का है ? 'रौति' (रोता है) (शब्द करता है ) इस (अदा०प०) कर्तृ वाच्य धातु का है। अथवा 'रोरूयमाण' ( बार २ या अतिशय रोर कर 'द्रवति' चलता है, इससे 'रुद्र' है। अथवा 'रोदयति' पापियों को रुलाता है, इस से वह 'रुद्र' है। “यदरुदत् तद् रुद्रस्य रुद्रत्वम्” जो रोया सो रुद्र को रुद्रपना है, काठक श्रुति है। “यदरौदीत् तद् रुद्रस्य रुद्रत्वम्” जो रोया सो रुद्र का रुद्रपना है, यह हारिद्रविक श्रुति है।
हिन्दी निरुक्त ( २६१ ) १० अ० । पा० ६ खं० इन श्रुतियों के निर्वचन के अनुसार इतिहास भी है कि- वह रुद्र अपने पिता प्रजापति को बाणों से बेधते हुये को देख कर शोक से रोया था, इसी से उसका नाम 'रुद्र' हुआ। हारिद्रव नाम मैत्रायणियों की एक शाखा है; उसी का यह दूसरा वचन है, अर्थ एक ही है, किन्तु दूसरी श्रुति दिखा कर आचार्य ने यह सूचित किया कि निर्वचन कर्म में और और शाखाओं से भी सहायता लेनी चाहिये । "तस्य०" उस रुद्र की यह ऋचा है—॥५॥ (खं० ६) निरु०- "इ॒मा रु॒द्राय॑ स्थि॒रध॑न्वने॒ गिर॑ः क्षि॒प्रेष॑वे दे॒वाय॑ स्व॒धाव्ने॑ । अषा॑ळ्हाय॒ सह॑मानाय वे॒धसे॑ ति॒ग्मायु॑धाय भरता शृणो॒तु नः॑ ॥” (ऋ० सं० ५, ४, १३, १) ॥ इमा रुद्राय दृढधन्वने गिरः क्षिप्रेषवे देवाय अन्नवते अषाढाय अन्यैः सहमानाय विधात्रे तिग्मायुधाय भरत शृणोतु नः । 'तिग्मम्' तेजतेः उत्साहकर्मणः । 'आयुधम्' आयोधनात् । तस्य एषा अपरा भवति-॥६॥ अर्थ :- "इमा रुद्राय०" इस ऋचा का और अगली "याते दिद्यु०" इस ऋचा का वसिष्ठ ऋषि है। मूलगद्य में विनियोग है ।
हिन्दी निरुक्त ( २६२ ) १० अ० १ पा० ७ खं० हे (स्तोतारः !) स्तुति करने वालो ! तुमसे कहा जाता है-'इमाः' इन 'गिरः' (स्तुतीः) स्तुतियों को 'स्थिरधन्वने' (दृढधन्वने) दृढ धनुष् वाले 'क्षिप्रेषवे' शीघ्र बाण वाले 'देवाय' दान आदि गुणों से युक्त 'स्वधावते' ( स्वधावते = अन्नैः अन्नवते ) स्वधा वाले या अन्नों से अन्न वाले 'अषा- ल्हाय' (अषाढाय = अनभिभूताय केनचित्) किसी से भी न तिरस्कार किये गये 'सहमानाय' (शत्रून् नित्यम् अभिभवते) नित्य ही शत्रुओं को तिरस्कार करने वाले 'वेधसे' (विधात्रे) जगत् के रचने वाले 'तिग्मायुधाय' ( तीक्ष्णायुधाय ) पैने आयुध वाले 'रुद्राय' रुद्र के लिये 'भरत' धारण करो या उच्चारण करो । (सः) वह रुद्र देव 'नः' (गिरः) हमारी स्तुतियों को 'शृणोतु' सुने ( यह हम आशा करते हैं ) ॥ यहाँ "सह- मानाय" इस बल वाचक शब्द से यह रुद्र मध्यम है ॥ 'तिग्म' (तीक्ष्ण) कैसे ? उत्साह अर्थ में 'तिज' (भ्वा०प०) धातु से है । 'आयुध' क्यों ? प्रायोधन होने से या उससे युद्ध किया जाता है, इससे । “तस्य०” उस रुद्र की यह और ऋचा है, जिस में पूर्व ऋचा के "विधात्रे” पद की विधान क्रिया दिखाई गई है कि- वह क्या विधान करता है ? ( खं० ७ ) निरु०- “ या ते॑ दि॒द्युद् दवसृष्टा दिवस्परि क्ष्मया चर॑ति॒ परि॒ सा वृणक्तु नः । स॒हस्रं॑ ते स्वपिवात
भेषजा मा नस्तोकेषु तनयेषु रीरिषः॥” ऋ० सं० ५, ४, १३, ३) ॥ या ते विद्युद्- अवसृष्टा ‘दिवस्परि’ दिवः- अधि । ‘विद्युतं’ द्यते र्वा। द्युते र्वा । [द्योततेर्वा।] ‘क्ष्मया चरति” ‘क्ष्मा’ पृथिवी, तस्यां चरति । तया चरति । विक्ष्मापयन्ती चरति- इति वा । परिवृणक्तु नः सा । सहस्रं ते स्वास्रवत्रन ! भेषज्यानि । मा नः त्वं पुत्रेषु च पौत्रेषु च रीरिषः । ‘तोकं’ तुद्यतेः । ‘तनयं’ तनोतेः । अग्निः अपि ‘रुद्रः’ उच्यते । तस्य एषा भवति ॥७॥ अर्थः- हे भगवन् ! रुद्र ! ‘या’ जो ‘ते’ तेरी ‘अवसृष्टा’ रचीहुई ‘विद्युत्’ ज्वर अतीसार आदि रोग रूपा विद्युत् या आयुध (शस्त्र) जिससे तू प्राणियों को हनन करता है ‘दिव- स्परि’ (दिवः अधि) द्युलोक के ऊपर ‘चरति’ विचरती है। और जो विद्युत् ‘क्ष्मया’ (‘क्ष्मा’ पृथिवी, तस्याम्) ‘क्ष्मा’पृथिवी उसतें विचरती है, अन्न के रूप को प्राप्त हुई जो पृथिवी उस में प्रवेश करके विचरती है, अन्न पान से उत्पन्न होने वाले रोगों के रूप में जो तेरी विद्युत् फिरती है, क्यों कि-अन्न-
हिन्दी निरुक्त ( २९४ ) १० अ० १ पा० ७ खं० पानसे ही सब रोग उत्पन्न होते हैं। अथवा जो तेरी दिद्युत् (रोग रूपा शक्ति) (विष्मापयन्ती) प्राणियों को नाश करती हुई विचरती है , 'सा' वह 'नः' हमको 'परिवृणक्तु' बचावे। और हे 'स्वपिवात' (स्वाप्त वचन) जिसकी आज्ञा का कोई उल्लङ्घन नहीं कर सकता ! (यानि) जो 'ते' तेरे 'सहस्रम्' अनन्त 'भेषज्यानि' औषध हैं-जिन से अपने भक्तों को रोगों से बचाते हो, वे औषध हमारे लिये हों। और (त्वम्) तू 'नः' हमारे 'स्तोकेषु' पुत्रों में 'तनयेषु' और पौत्रों में 'मा' मत 'रीरिषः' रिसा- मत क्रोध कर। यह हम चाहते हैं। 'दिद्युत्' (रोग) कैसे ? द्यति = 'दो' अवखण्डने (दि० प०) धातु से है। क्यों कि- वह नित्य ही आयु का अवदान (खण्डन) करती है। अथवा दीप्ति अर्थ में 'द्युत्' (भ्वा० आ०) धातु से है। क्यों कि-वह शरीर में होतेही (द्योतमप्रकाशम) करती है, प्रतीत होती है। 'तोक' क्या ? पुत्र । क्यों व्यथा अर्थ में 'तुद्' (तु० उ०) कर्मवाच्य धातु से है, क्यों कि-शासन करते हुये पिता से नित्य ही व्यथित किया जाता है,-'ऐसा कर' 'ऐसा मत कर'। 'तनय' क्या ? पौत्र (पोता)। क्यों ? यह विस्तार अर्थ में 'तन्' (त० उ०) धातु से है। क्यों कि-वह पितासे बहुतही तत या विस्तृत = फैला हुआ होता है। यद्यपि 'तोक' और 'तनय' शब्द दोनों ही अपत्य = सन्तान के वाचक पर्याय शब्द हैं, तथापि एक वाक्य में दोनों के आजाने से इनका भिन्न अर्थ कल्पित किया गया है। भाष्यकार की इस रीति (न्याय) का अन्यत्र भी पर्याय शब्दों में ध्यान रखना चाहिये।
हिन्दी निरुक्त ( २६५ ) १० अ० १ पा० ७ खं० अग्निभी 'रुद्र' कहा जाता है। "तस्य०" उस अग्नि रुद्र की यह ऋचा है॥ ७ ॥ व्याख्या । जिस 'रुद्र' की यहां व्याख्या है, वह रुद्र मध्यलोक के वायु आदि देवताओं में तीसरा देवता है, उसी की स्तुति "याते दिद्युत्०" मन्त्र से है। किन्तु 'रुद्र' देव के मध्यम होने पर भी इस मन्त्र में 'उसकी रची हुई 'दिद्युत्' (रोग- देवता) द्युलोक में और पृथिवी लोक में भी विचरती है, कहा गया है। इस से इसका मध्यम होना संशय-युक्त होता है ? तथापि "सभी देवता द्युलोक स्थान के ही हैं" "किन्तु उनके कर्माधिकार के स्थान अलग २ नियत हैं" जैसे एक स्थान [ देश ] के मनुष्य भिन्न २ देशों में राज्य करें । यह बात इस मन्त्र के "दिवस्परि" वाक्य से जानी जाती है। इसी से पृथिवीस्थान अग्नि के अधिकार में ( अ० ७ पा० ४ खं० २) "अग्निमीळे०" इस निगम में "देव" शब्द की व्याख्या भाष्यकार इस प्रकार करते हैं- "देवो दानाद् वा। दीपनाद् वा। द्योतनाद् वा। द्युस्थानो भवति-इति वा ।" अर्थात्-यहां "देव" क्यों है ! अथवा द्युस्थान होता है इस का प्रयोजन यह है कि - जिस का द्युलोक स्थान है वह 'देव' है। इसी व्याख्या के आधार पर 'देव' पद के
हिन्दी निरुक्त ( ३६६ ) १० अ० १ पा० ७ खं० सम्बन्ध से सभी देवता द्य स्थान हैं सभी देवताओं का द्युलोक स्थान समान है। कर्माधिकार स्थान तो अग्नि का पृथिवी, इन्द्र का अन्तरिक्ष और आदित्य का द्युलोक है। ऐसे ही रुद्रदेवता का कर्माधिकार तीनों लोकों में भी बताया हुआ है - “नमोऽस्तु रुद्रेभ्यो ये दिवि येषां वर्षमिषवः । ” ( य० वा० सं० १६, ६४) अर्थात्- जो रुद्र द्युलोक में रहते हैं, और जिनका वृष्टि ही वाण हैं,-जो वृष्टि अतिवृष्टि आदि क्लेशों के द्वारा प्राणियों को मारते हैं, उन रुद्रों के लिये नमस्कार है । वृष्टिकर्म द्य लोक से होता है, और द्य लोक में ही रुद्रों की स्थिति तथा वृष्टि ही उनके आयुध हैं, इस प्रकार इस मन्त्र में रुद्रों का कर्माधिकार स्थान द्युलोक कहागया । “नमोऽस्तु रुद्रेभ्यो येऽन्तरिक्षे येषां वातइषवः।” [ य० वा० सं० १६, ६५ ] अर्थात्-जो रुद्र अन्तरिक्ष में रहते हैं, जिन के वायु ही आयुध हैं, कुवायु से अन्न को नाश करके अथवा वायु रोग को उत्पन्न करके प्राणियों को मारते हैं, उन रुद्रों के अर्थ नमस्कार हो । वायु का अन्तरिक्ष स्थान प्रसिद्ध है । “नमोऽस्तु रुद्रेभ्यो ये पृथिव्यां येषामन्नमिषवः । ” [ य० वा० सं० १६,६६ ] । अर्थात्-जो रुद्र पृथिवी में रहते हैं, जिनके अन्न ही आयुध = शस्त्र हैं, जो कदन्न [सड़े अन्न] के भक्षण में जनों को प्रवृत्त करके अथवा चोरी में प्रवृत्त करके उन्हें रोगी करके मारते हैं उन रुद्रों के अर्थ नमस्कार हो इस सब कथन का सार यह है कि-सब देवताओं का
हिन्दी निरुक्त ( २६७ ) १० अ० १ पा० ८ खंड लोक या मुख्य स्थान द्युलोक है, भिन्न २ लोक उनके कर्माधि- कार को लेकर ही बताए हैं ॥ ७ ॥ ( खं० ८ ) निरु०-“जराबोध तद्विविड्ढि विशे विशेयज्ञि- याय। स्तोमं रुद्राय दृशीकम्॥”[ऋ०सं० १, २, २३, ५] ( सा० सं० छ० आ० १, १, २, ५) ॥ ‘जरा’ स्तुतिः । जरतेः स्तुतिकर्मणः । तां बोध तया बोधयितः ! इति वा । तद् विविड्ढि तत् कुरु मनुष्यस्य मनुष्यस्य यजनाय स्तोमं रुद्राय दर्शनीयम् ॥ ‘इन्द्रः’ इरां दृणाति-इति वा । इरां ददाति- इति वा । इरां दधाति-इति वा । इरां दारयते-इति वा । इन्दवे द्रवति- इति वा । इन्दौ रमते-इति वा । इन्धे भूतानि-इति वा । “ तद्यदेनं प्राणैः समैन्धं स्तदिन्द्रस्येन्द्रत्वम् इति विज्ञायते ” इदं करणाद्-इति-आग्रायणः । इदं दर्शनाद्-इति औपमन्यवः ।
हिन्दी निरुक्त (२६८) १० अ० १पा० ८ खं०
इन्द्ते वा ऐश्वर्यकर्मणः । इन्धन्-शत्रूणां दारयिता वा, द्रावयिता वा । आदरयिता वा यज्वनाम् । तस्य-एषा भवति- ॥ ८ ॥ अर्थः—" जरा बोध० " इस ऋचा का शुनः शेप ऋषि है । " अश्वं न त्वा वारवन्तम्० " ( ऋ० सं० १ मं० ६ अ० ४ सू०) इस सूक्त में प्रातरनुवाक में विनियोग है । हे भगवन् ! अग्ने ! रुद्र ! 'जरा' ( स्तुतिः ) जो यह तेरी स्तुति मुझसे उच्चारण की जा रही है, ( ताम् ) उसको (बोध ) जान । अथवा हे 'जराबोध !' ( तया बोधयितः ! ) उस स्तुति के द्वारा होतृ कर्म में वर्त्तमान हुआ यजमानों के अभिमत अर्थ को सम्पादन करने वाले ! = सिद्ध करने वाले ! 'यजिष्ठाय' यज्ञ के करने वाले 'विशे-विशे' ( मनुष्याय मनुष्याय ) मनुष्य मनुष्य के लिये अथवा ( मनुष्यस्य मनुष्य- स्य यजनाय ) मनुष्य मनुष्य के यजन के अर्थ 'तत्' वह 'वि- विड्ढि ' (कुरु) कर—जो तेरा यज्ञ में कर्त्तव्य है । उससे वह मनुष्य देवताओं के स्तोता तुझ रुद्र के लिये 'दृशीकम्' (दर्शनी- यम् ) दर्शनीय या श्रवणीय 'स्तोमम्' स्तोत्र को (करिष्यति) करेगा । “ यो अग्नौ रुद्रो यो अप्स्वन्तर्य ओषधीर्वी- रुध आविवेश । य इमा विश्वा भुवनानि चाक्ल- पे तस्मै रुद्राय नमो अस्त्वग्नये ॥ ” ( अथ० सं० ७, ८७, १ ] ॥
हिन्दी निरुक्त ( २६६ ) १० अ० । पा० = खं० अर्थात्-जो रुद्र अग्नि में जो जलों में जो ओषधियों के मध्यमें, वीरुध् (तृणों) के मध्य में प्रवेश किये हुए है, जिसने इनमें प्रवेश किया था, जिसने इन सब भुवनों को बनाया है उस रुद्र अग्नि को नमस्कार हो । इस मन्त्र में स्पष्ट ही अग्नि और रुद्र का अभेद है ॥ 'इन्द्र' ( ४ ) क्यों ? इरा (अन्न) को विदारण करता है- वर्षा से बीज को भिगोकर अङ्कुर उत्पन्न करता हुआ उसे फाड़देता है। इस प्रकार यह 'इरादार' का 'इन्द्र' नाम है। यही देवताओं के नामों की परोक्षता है, कि वे प्रत्यक्ष वृत्ति शब्दों के संक्षेप या विकृत शब्द रूप हैं। 'इन्द्र' शब्द का पूर्व भाग 'इरा' शब्द से है और दूसरा भाग 'दृणाति' से या 'दार' से है। जैसे "अग्रणी" से "अग्नि"। ऐसे परोक्ष नाम देवताओं को बहुत प्रिय हैं, वे प्रत्यक्ष प्रशंसा के नामों से अप्रसन्न होते हैं। जैसा कि- “परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः” ( ब्राह्मण ) । यही प्रकार अन्य देवताओं के नामों के अर्थों में ध्यान में रखना चाहिए। देवता अपने तत्व को अपने नाम में छिपाकर अविद्वानों से सदा परोक्ष = अप्रत्यक्ष रहते हैं, किन्तु विद्वान् पुरुष उनके नामों की व्युत्पत्ति के द्वारा दिव्य दृष्टिसे उनके आत्मतत्व को जानकर उनके स्वरूपको प्राप्त होते हैं। इस प्रकार देवता- ओं के नामों की व्युत्पत्ति में सकल पुरुषार्थ = मनुष्य का सम्पूर्ण आङ्कित स्थापित है, इसी सिद्धि के लिये देवता नामों के निर्वचन में महान् यत्न किया जाता है।
हिन्दी निरुक्त ( ३०० ) १० अ० १ पा० ४ खं० और देवताओं में भी इन्द्र देवता अध्यात्म और अधिदैवत दोनों अर्थों में सब से अधिक स्तुति का भाग लेने वाला है, और देवताओं से इनमें अधिक महिमा है, इस कारण इस के नाम की व्याख्या को आचार्य बहुत ही विस्तार से करते हैं। अथवा इरा को देता है, इससे इन्द्र है। इराद = इरा- दाता = इन्द्रः । अथवा 'इरां दधाति' इरा (अन्न) को धारण करता है। 'इराध' = इराधारयिता = इन्द्र। अथवा 'इरां दारयते' इरा (अन्न) को दारण करता है। अथवा 'इरां धारयते' 'इरा' (अन्न) को धारण करता है। अथवा 'इन्दवे द्रवति' इन्दु (सोम) के लिये द्रुत होता है = चलता है। अथवा 'इन्दौ रमते' इन्दु (सोम) में रमता है। अथवा 'इन्धे भूतानि' भूतों को = प्राणियों को अन्न की उत्पत्ति के अधिदेव में स्थित हुआ अथवा अध्यात्म में स्थित हुआ भोजन कराने के द्वारा द्युतिमान् = कान्तिमान् करता है, सो यह "इन्ध = इन्द्र" है। और यह दूसरा इन्द्र का इन्द्रपना ब्राह्मण में कहा है- "तद् यदेनं प्राणैः०" जो कि-इसे प्राणों के अधि- देवताओं ने समिन्धन = सन्दीपन किया है, यही इन्द्रका इन्द्रत्व है, यह जाना जाता है। इदंकरण से इन्द्र है-इस जगत् को इसने बनाया है इस से यह इन्द्र है,-यह आग्रायण आचार्य मानते हैं। इदं दर्शन से इन्द्र है-इस जगत् को इसने देखा है, इस से यह 'इन्द्र' है, यह औपमन्यव आचार्य मानते हैं। अथवा ऐश्वर्य अर्थ में 'इन्द' (भ्वा० प०) धातु से है।
हिन्दी निरुक्त ( ३०१ ) १० अ० १पा० ६खं० क्योंकि-वह ऐश्वर्यवान् है, इससे वह 'इन्द्र' है । अथवा 'इन्दत्' ऐश्वर्ययुक्त होता हुआ शत्रुओं का दारणा करने वाला है, अथवा द्रावण करने वाला = भगाने वाला है, इससे 'इन्द्र' है । अथवा यज्बनों का = यज्ञ करने वालों का आदर करने वाला है, इस से इन्द्र है । “तस्य०” उस इन्द्र की यह ऋचा है-॥८॥ ( खं० ६ ) निरु०-“अद॑र्दरुत्स॒मसृ॑जो॒ विखा॑नि॒ त्वम॑र्ण॒वान् बद्वबधानां॑ अरम्णाः । म॒हान्त॒मिन्द्र॒ पर्व॑तं॒ वि यदद्वः सृ॒जो विधा॑रा॒ अव॑ दान॒वं हन् ॥” (ऋ०सं० ४,१,३२,१ सा०सं०छं०आ० ४,१,३,३) अहृणाः उत्सम् । 'उत्सः' उत्सरणाद् वा । उत्सदनाद् वा । उत्स्य- न्दनाद् वा । उनत्तेर्वा । व्यसृजः अस्य खानि । त्वम् अर्णवान् = अर्ण- स्वतः एतान् माध्यमिकान् संस्त्यायन् बाबध्य- मानान् अरम्णाः । 'रम्णातिः' संयमनकर्मा, विसर्जनकर्मा वा । “महान्तमिन्द्र ! पर्वतम्” मेघं यद् व्यवृणोः । व्यसृजः अस्य धारा अवहन् एनं 'दानवं' दान- कर्माणम् ।
हिन्दी निरुक्त ( ३०२ ) १० अ० १ पा० ६ खं० तस्य एषा अपरा भवति ॥९॥ अर्थ :- “अदर्दः०” इस ऋचा का गातु आत्रेय ऋषि है । हे भगवन् ! ‘इन्द्र !’ ‘त्वम्’ तैने ‘उत्सम्’ ( मेघम् ) मेघ को ‘अदर्दः’ ( अहनाः ) फाड़ा, ‘अस्य’ इस (मेघ) के ‘खानि’ (बिलानि) छिद्रों को ‘वि-असृजः’ खोला, (त्वम्) तैने ‘अर्ण- वान्’ ( अर्णस्वतः एतान् माध्यमिकान् बाबध्यमानान् संस्त्या- यान् ) इन जल से भरे हुए मध्यलोक के मेघ समूहों को ‘अरम्णाः’ इकट्ठा किया है—वश में किया है, या रचा है, या छोड़ा है । ‘यत्’ जोकि-‘महान्तम्’ बड़े ‘पर्वतम्’ ( मेघम् ) मेघको जो अन्य का खुले द्वार करना अशक्य था, ‘खि-वः’ ( व्यवृणोः ) खोल दिया है,—उसके जल के बहाने वाले द्वार खोल दिये हैं, उससे ‘दानवम्’ ( एनं उदकदातारं मेघम् ) इस जलके देने वाले मेघको ‘अव-हन्’ हनन करते हुए ने ‘तैने ‘धाराः’ धाराओं को ‘विसृजः’ छोड़ा है । ‘उत्स’ (मेघ) कैसे ? उत्सरणा ( ऊपर को गमन ) करने से । अथवा उत्सदन से—ऊपर को सन्न ( बैठा हुआ ) जैसा- होने से । अथवा उत्स्यन्दन से ऊपर अवस्थित होकर स्यन्दन करता है = बहता है, इससे ‘उत्स’ है । अथवा भिगोने अर्थ में ‘उन्द्’ (रु०) धातुसे है । क्योंकि—वह सब जगत् को गीला बना देता है इससे उन्दन करने से यह ‘उत्स’ है । “अरम्णाः” पद में ‘रभ’ ( क्रया० प० ) धातु संयमन अर्थ में है। अथवा विसर्जन अर्थ में है । ‘दानव’ क्या ? दानकर्मा = देने वाला ॥ “तस्य०” उस इन्द्र की यह और ऋचा है—पहिले कहा
हिन्दी निरुक्त ( ३०३ ) १० अ० १ पा० १० ख० है कि इसके रसानुप्रदान (१) वृत्रवध (२) और जो कोई बलकृति (३) कर्म हैं, उनमें रसानुप्रदान और वृत्रवध पूर्व उदाहरण में दिखाया गया अब बलकृति के अर्थ यह और ऋचा है ॥ ६ ॥ (खं० १०) निरु०-“यो जात एव प्रथमो मनस्वांन्देवो देवा- न्क्रतुना पर्यभूषत् । यस्य शुष्माद् रोदसी अभ्य- सेतां नृम्णस्य महा सजनास इन्द्रः ॥” [ऋ० सं० २, ६, ७, १ ] ॥ यो जायमान एव प्रथमो मनस्वी देवो देवान् ‘क्रतुना’ कर्मणा पर्यभवत्, पर्यगृह्णात्, पर्य्यरक्षत्, अत्यक्रामद्-इति वा। यस्य बलात् द्यावापृथिव्यौ अपि अबिभीताम्, नृम्णस्य महा बलस्य महत्वेन स जनास इन्द्र इति ॥ ऋषिरिष्टार्थस्य प्रीतिर्भवति आख्यानसंयुक्ता । ‘पर्जन्यः’ तृपेः आद्यन्तविपरीतस्य। तर्पयिता जन्यः । परो जेता वा । परो जनयिता वा । प्रार्जयिता वा रसानाम् । तस्य एषा भवति ॥१०॥ अर्थः-“यो जात एव०” इस ऋचा का गृत्समद ऋषि
हिन्दी निरुक्त ( ३०४ ) १० अ० १ पा० १० खं० है। इन्द्र मनस्वान् के लिये पुरोडाश होता है, उसकी यह याज्या है। गृत्समद् इन्द्र देव के वरदान से इन्द्र के सदृश रूप को प्राप्त होगया था, जब वह इन्द्र जैसा आकृति वाला होगया, तो उसे देखकर असुरों ने उसे इन्द्र समझा, और उसे मारने की ठानी, कि- 'अब यह मरुद् गणों (देवताओं) के बिना अकेला है, इसे हम मार सकेंगे, इस विचार से उन्हों ने गृत्समद को घेर लिया । तब उसने डर कर इस सूक्त से इन्द्र की स्तुति की, और असुरों को अपने को ब्राह्मण बताया- 'यः' जो 'जातः' (जायमानः) 'एव' उत्पन्न होते ही 'प्रथमः' (मुख्यः सर्वभूतानाम्) सब प्राणियों के प्रति मुख्य हुआ और 'मनस्वान्' (मनस्वी) मेधावी हुआ । क्यों कि- और मनुष्य समय पाकर क्रम से प्रधान और मेधावी होते हैं, और इन्द्र देव अपने जन्म के साथ ही इन गुणों से युक्त होता है, यह उसका अन्यों की अपेक्षा अतिशय है। 'देवः' देव इन्द्र ने 'देवान्' और देवताओं को 'क्रतुना' (कर्मणा) कर्म से 'पर्यभूषत्' (पर्यभवत्) दबाया है- देवतापने में समान होने पर भी और देवों पर कर्म से अपना आधिपत्य स्थापन किया है। अथवा (पर्यगृह्णात्) अपने स्वामित्व से उन्हें सब प्रकार अधीन किया है। अथवा (पर्यरक्षत) मुख्यता से रक्षित किया है अथवा [अत्यक्रामत्] प्रभाव से उल्लङ्घन किया है। 'यस्य' जिसके 'शुष्मात्' (बलात्) बल से 'रोदसी' (द्यावा- पृथिव्यौ-अपि, द्यावा-पृथिवी भी 'अभ्यसेताम्' (अबिभीताम्) डरे हैं 'नृम्णस्य' (बलस्य = सैन्यस्य) सैन्य के 'महा' [महत्त्वेन] अधिक होने से, 'यह हम दोनों को अवश्य दबायेगा' इस