भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1067, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 1067

हिन्दी निरुक्त ( ३०१ ) १० अ० १पा० ६खं० क्योंकि-वह ऐश्वर्यवान् है, इससे वह 'इन्द्र' है । अथवा 'इन्दत्' ऐश्वर्ययुक्त होता हुआ शत्रुओं का दारणा करने वाला है, अथवा द्रावण करने वाला = भगाने वाला है, इससे 'इन्द्र' है । अथवा यज्बनों का = यज्ञ करने वालों का आदर करने वाला है, इस से इन्द्र है । “तस्य०” उस इन्द्र की यह ऋचा है-॥८॥ ( खं० ६ ) निरु०-“अद॑र्दरुत्स॒मसृ॑जो॒ विखा॑नि॒ त्वम॑र्ण॒वान् बद्वबधानां॑ अरम्णाः । म॒हान्त॒मिन्द्र॒ पर्व॑तं॒ वि यदद्वः सृ॒जो विधा॑रा॒ अव॑ दान॒वं हन् ॥” (ऋ०सं० ४,१,३२,१ सा०सं०छं०आ० ४,१,३,३) अहृणाः उत्सम् । 'उत्सः' उत्सरणाद् वा । उत्सदनाद् वा । उत्स्य- न्दनाद् वा । उनत्तेर्वा । व्यसृजः अस्य खानि । त्वम् अर्णवान् = अर्ण- स्वतः एतान् माध्यमिकान् संस्त्यायन् बाबध्य- मानान् अरम्णाः । 'रम्णातिः' संयमनकर्मा, विसर्जनकर्मा वा । “महान्तमिन्द्र ! पर्वतम्” मेघं यद् व्यवृणोः । व्यसृजः अस्य धारा अवहन् एनं 'दानवं' दान- कर्माणम् ।

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