निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३०० ) १० अ० १ पा० ४ खं० और देवताओं में भी इन्द्र देवता अध्यात्म और अधिदैवत दोनों अर्थों में सब से अधिक स्तुति का भाग लेने वाला है, और देवताओं से इनमें अधिक महिमा है, इस कारण इस के नाम की व्याख्या को आचार्य बहुत ही विस्तार से करते हैं। अथवा इरा को देता है, इससे इन्द्र है। इराद = इरा- दाता = इन्द्रः । अथवा 'इरां दधाति' इरा (अन्न) को धारण करता है। 'इराध' = इराधारयिता = इन्द्र। अथवा 'इरां दारयते' इरा (अन्न) को दारण करता है। अथवा 'इरां धारयते' 'इरा' (अन्न) को धारण करता है। अथवा 'इन्दवे द्रवति' इन्दु (सोम) के लिये द्रुत होता है = चलता है। अथवा 'इन्दौ रमते' इन्दु (सोम) में रमता है। अथवा 'इन्धे भूतानि' भूतों को = प्राणियों को अन्न की उत्पत्ति के अधिदेव में स्थित हुआ अथवा अध्यात्म में स्थित हुआ भोजन कराने के द्वारा द्युतिमान् = कान्तिमान् करता है, सो यह "इन्ध = इन्द्र" है। और यह दूसरा इन्द्र का इन्द्रपना ब्राह्मण में कहा है- "तद् यदेनं प्राणैः०" जो कि-इसे प्राणों के अधि- देवताओं ने समिन्धन = सन्दीपन किया है, यही इन्द्रका इन्द्रत्व है, यह जाना जाता है। इदंकरण से इन्द्र है-इस जगत् को इसने बनाया है इस से यह इन्द्र है,-यह आग्रायण आचार्य मानते हैं। इदं दर्शन से इन्द्र है-इस जगत् को इसने देखा है, इस से यह 'इन्द्र' है, यह औपमन्यव आचार्य मानते हैं। अथवा ऐश्वर्य अर्थ में 'इन्द' (भ्वा० प०) धातु से है।