निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३०४ ) १० अ० १ पा० १० खं० है। इन्द्र मनस्वान् के लिये पुरोडाश होता है, उसकी यह याज्या है। गृत्समद् इन्द्र देव के वरदान से इन्द्र के सदृश रूप को प्राप्त होगया था, जब वह इन्द्र जैसा आकृति वाला होगया, तो उसे देखकर असुरों ने उसे इन्द्र समझा, और उसे मारने की ठानी, कि- 'अब यह मरुद् गणों (देवताओं) के बिना अकेला है, इसे हम मार सकेंगे, इस विचार से उन्हों ने गृत्समद को घेर लिया । तब उसने डर कर इस सूक्त से इन्द्र की स्तुति की, और असुरों को अपने को ब्राह्मण बताया- 'यः' जो 'जातः' (जायमानः) 'एव' उत्पन्न होते ही 'प्रथमः' (मुख्यः सर्वभूतानाम्) सब प्राणियों के प्रति मुख्य हुआ और 'मनस्वान्' (मनस्वी) मेधावी हुआ । क्यों कि- और मनुष्य समय पाकर क्रम से प्रधान और मेधावी होते हैं, और इन्द्र देव अपने जन्म के साथ ही इन गुणों से युक्त होता है, यह उसका अन्यों की अपेक्षा अतिशय है। 'देवः' देव इन्द्र ने 'देवान्' और देवताओं को 'क्रतुना' (कर्मणा) कर्म से 'पर्यभूषत्' (पर्यभवत्) दबाया है- देवतापने में समान होने पर भी और देवों पर कर्म से अपना आधिपत्य स्थापन किया है। अथवा (पर्यगृह्णात्) अपने स्वामित्व से उन्हें सब प्रकार अधीन किया है। अथवा (पर्यरक्षत) मुख्यता से रक्षित किया है अथवा [अत्यक्रामत्] प्रभाव से उल्लङ्घन किया है। 'यस्य' जिसके 'शुष्मात्' (बलात्) बल से 'रोदसी' (द्यावा- पृथिव्यौ-अपि, द्यावा-पृथिवी भी 'अभ्यसेताम्' (अबिभीताम्) डरे हैं 'नृम्णस्य' (बलस्य = सैन्यस्य) सैन्य के 'महा' [महत्त्वेन] अधिक होने से, 'यह हम दोनों को अवश्य दबायेगा' इस