भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1071

हिन्दी निरुक्त ( ३०५ ) १० अ० १ पा० १० खं० कारण द्यावापृथिवी भी दोनों जिसके बलसे डरे । 'जनासः!' हे असुरजनों ! “सः-इन्द्रः” वह इन्द्र है, मैं इन्द्र नहीं, मैं ब्राह्मण हूं, मैं उसी के वर से उसके समान रूप को प्राप्त हुआ हूं ॥ अनधिकार में किसी उत्तम सम्पत्तिका मिलना भी अनर्थ- कारी हो सकता है, यह उपदेश इस मन्त्र के आख्यान से मिल सकता है। “ऋषेर्दैष्टार्थस्य०” जिसने इन्द्र देव की मैत्रीका अनुभव किया है,उस इन्द्रके सखा गृत्समद् ऋषिकी यहप्रीति=स्तुति आख्यान = इतिहास-संयुक्त है—गृत्समद् ने इन्द्र की प्रीति को इतने परिमाण तक प्राप्त कियो था कि—वह इतिहासमें गाई जाती है, इतिहास में स्थिर होगई है। इससे आचार्य ने दिखाया कि- मन्त्रों का ऐतिहासिक अर्थ भी ढूंढना—मन्त्रों में इतिहास सम्बन्धी भी अर्थ हैं। 'पर्जन्य' ( ५ ) शब्द तृप्ति अर्थ में 'तृप' (दि० प० ) धातु का उसके आदि और अन्त के अक्षरों को बदलने से है- 'तर्पयिता जन्यः' (सब देश का तृप्त करने वाला)। पूर्व भाग 'तृप्' धातु से और उत्तर भाग 'जन्यः' शब्द से है। अथवा 'परो जेता' (बड़ा जीतने वाला) होने से 'पर्जन्य' है । 'पर' शब्द से पूर्व पद और 'जि' (स्वा०प० ) धातु से उत्तरपद है । अथवा ' परो जनयिता ' ( बड़ा उत्पन्न करने वाला ) वही पूर्वपद और 'जन' (दि०) धातु से उत्तर पद है। अथवा 'प्रार्जयिता रसानाम्' (रसों को संग्रह करने