निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २६२ ) १० अ० १ पा० ७ खं० हे (स्तोतारः !) स्तुति करने वालो ! तुमसे कहा जाता है-'इमाः' इन 'गिरः' (स्तुतीः) स्तुतियों को 'स्थिरधन्वने' (दृढधन्वने) दृढ धनुष् वाले 'क्षिप्रेषवे' शीघ्र बाण वाले 'देवाय' दान आदि गुणों से युक्त 'स्वधावते' ( स्वधावते = अन्नैः अन्नवते ) स्वधा वाले या अन्नों से अन्न वाले 'अषा- ल्हाय' (अषाढाय = अनभिभूताय केनचित्) किसी से भी न तिरस्कार किये गये 'सहमानाय' (शत्रून् नित्यम् अभिभवते) नित्य ही शत्रुओं को तिरस्कार करने वाले 'वेधसे' (विधात्रे) जगत् के रचने वाले 'तिग्मायुधाय' ( तीक्ष्णायुधाय ) पैने आयुध वाले 'रुद्राय' रुद्र के लिये 'भरत' धारण करो या उच्चारण करो । (सः) वह रुद्र देव 'नः' (गिरः) हमारी स्तुतियों को 'शृणोतु' सुने ( यह हम आशा करते हैं ) ॥ यहाँ "सह- मानाय" इस बल वाचक शब्द से यह रुद्र मध्यम है ॥ 'तिग्म' (तीक्ष्ण) कैसे ? उत्साह अर्थ में 'तिज' (भ्वा०प०) धातु से है । 'आयुध' क्यों ? प्रायोधन होने से या उससे युद्ध किया जाता है, इससे । “तस्य०” उस रुद्र की यह और ऋचा है, जिस में पूर्व ऋचा के "विधात्रे” पद की विधान क्रिया दिखाई गई है कि- वह क्या विधान करता है ? ( खं० ७ ) निरु०- “ या ते॑ दि॒द्युद् दवसृष्टा दिवस्परि क्ष्मया चर॑ति॒ परि॒ सा वृणक्तु नः । स॒हस्रं॑ ते स्वपिवात