भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1057

हिन्दी निरुक्त ( २६१ ) १० अ० । पा० ६ खं० इन श्रुतियों के निर्वचन के अनुसार इतिहास भी है कि- वह रुद्र अपने पिता प्रजापति को बाणों से बेधते हुये को देख कर शोक से रोया था, इसी से उसका नाम 'रुद्र' हुआ। हारिद्रव नाम मैत्रायणियों की एक शाखा है; उसी का यह दूसरा वचन है, अर्थ एक ही है, किन्तु दूसरी श्रुति दिखा कर आचार्य ने यह सूचित किया कि निर्वचन कर्म में और और शाखाओं से भी सहायता लेनी चाहिये । "तस्य०" उस रुद्र की यह ऋचा है—॥५॥ (खं० ६) निरु०- "इ॒मा रु॒द्राय॑ स्थि॒रध॑न्वने॒ गिर॑ः क्षि॒प्रेष॑वे दे॒वाय॑ स्व॒धाव्ने॑ । अषा॑ळ्हाय॒ सह॑मानाय वे॒धसे॑ ति॒ग्मायु॑धाय भरता शृणो॒तु नः॑ ॥” (ऋ० सं० ५, ४, १३, १) ॥ इमा रुद्राय दृढधन्वने गिरः क्षिप्रेषवे देवाय अन्नवते अषाढाय अन्यैः सहमानाय विधात्रे तिग्मायुधाय भरत शृणोतु नः । 'तिग्मम्' तेजतेः उत्साहकर्मणः । 'आयुधम्' आयोधनात् । तस्य एषा अपरा भवति-॥६॥ अर्थ :- "इमा रुद्राय०" इस ऋचा का और अगली "याते दिद्यु०" इस ऋचा का वसिष्ठ ऋषि है। मूलगद्य में विनियोग है ।