निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २९० ) १० अ० १ पा० ५ खं० योग्य स्तोत्रों से 'नाभाकस्य' और नाभाक ऋषि की 'प्रशस्ति- भिः' प्रशंसाओं से = स्तोत्रों से 'ष्ठु' (अभिष्टौमि) सुन्दर अभिमुख भाव से स्तुति करता हूं, 'यः' जो नाभाक 'सिन्धू- नाम्' ( स्यन्दमानानाम् आसाम् अपाम् ) बहने वाले इन जलों के 'उपोदये' उदय काल में = वर्षाकाल में 'सप्तस्वसा' ( सप्तस्वसारम्-एनम्-आह ) इसे सात बहिनों वाला कहता है-अथवा आदि सात मध्यमा वाणियें इसकी बहिनें हैं ऐसा कहता है । 'सः' वह वरुण ' मध्यमः ' मध्यम है। [ इति निरुच्यते ] इस प्रकार इस मन्त्र में शब्द के द्वारा ही वरुण मध्यम कहा गया है । “नमन्ता मन्यके समे” ( माभूवन्नन्यके सर्वे, - ये नो द्विषन्ति दुर्धियः = पापधियः = पापसंकल्पाः ) अर्थात्- उस वरुण के अनुग्रह से वे सब न होवें जो दुष्ट बुद्धि वाले = पाप बुद्धि वाले = पाप संकल्प वाले हमें द्वेष करते हैं । 'रुद्र' (३) किस धातु का है ? 'रौति' (रोता है) (शब्द करता है ) इस (अदा०प०) कर्तृ वाच्य धातु का है। अथवा 'रोरूयमाण' ( बार २ या अतिशय रोर कर 'द्रवति' चलता है, इससे 'रुद्र' है। अथवा 'रोदयति' पापियों को रुलाता है, इस से वह 'रुद्र' है। “यदरुदत् तद् रुद्रस्य रुद्रत्वम्” जो रोया सो रुद्र को रुद्रपना है, काठक श्रुति है। “यदरौदीत् तद् रुद्रस्य रुद्रत्वम्” जो रोया सो रुद्र का रुद्रपना है, यह हारिद्रविक श्रुति है।