भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1061

हिन्दी निरुक्त ( २६५ ) १० अ० १ पा० ७ खं० अग्निभी 'रुद्र' कहा जाता है। "तस्य०" उस अग्नि रुद्र की यह ऋचा है॥ ७ ॥ व्याख्या । जिस 'रुद्र' की यहां व्याख्या है, वह रुद्र मध्यलोक के वायु आदि देवताओं में तीसरा देवता है, उसी की स्तुति "याते दिद्युत्०" मन्त्र से है। किन्तु 'रुद्र' देव के मध्यम होने पर भी इस मन्त्र में 'उसकी रची हुई 'दिद्युत्' (रोग- देवता) द्युलोक में और पृथिवी लोक में भी विचरती है, कहा गया है। इस से इसका मध्यम होना संशय-युक्त होता है ? तथापि "सभी देवता द्युलोक स्थान के ही हैं" "किन्तु उनके कर्माधिकार के स्थान अलग २ नियत हैं" जैसे एक स्थान [ देश ] के मनुष्य भिन्न २ देशों में राज्य करें । यह बात इस मन्त्र के "दिवस्परि" वाक्य से जानी जाती है। इसी से पृथिवीस्थान अग्नि के अधिकार में ( अ० ७ पा० ४ खं० २) "अग्निमीळे०" इस निगम में "देव" शब्द की व्याख्या भाष्यकार इस प्रकार करते हैं- "देवो दानाद् वा। दीपनाद् वा। द्योतनाद् वा। द्युस्थानो भवति-इति वा ।" अर्थात्-यहां "देव" क्यों है ! अथवा द्युस्थान होता है इस का प्रयोजन यह है कि - जिस का द्युलोक स्थान है वह 'देव' है। इसी व्याख्या के आधार पर 'देव' पद के