निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २९४ ) १० अ० १ पा० ७ खं० पानसे ही सब रोग उत्पन्न होते हैं। अथवा जो तेरी दिद्युत् (रोग रूपा शक्ति) (विष्मापयन्ती) प्राणियों को नाश करती हुई विचरती है , 'सा' वह 'नः' हमको 'परिवृणक्तु' बचावे। और हे 'स्वपिवात' (स्वाप्त वचन) जिसकी आज्ञा का कोई उल्लङ्घन नहीं कर सकता ! (यानि) जो 'ते' तेरे 'सहस्रम्' अनन्त 'भेषज्यानि' औषध हैं-जिन से अपने भक्तों को रोगों से बचाते हो, वे औषध हमारे लिये हों। और (त्वम्) तू 'नः' हमारे 'स्तोकेषु' पुत्रों में 'तनयेषु' और पौत्रों में 'मा' मत 'रीरिषः' रिसा- मत क्रोध कर। यह हम चाहते हैं। 'दिद्युत्' (रोग) कैसे ? द्यति = 'दो' अवखण्डने (दि० प०) धातु से है। क्यों कि- वह नित्य ही आयु का अवदान (खण्डन) करती है। अथवा दीप्ति अर्थ में 'द्युत्' (भ्वा० आ०) धातु से है। क्यों कि-वह शरीर में होतेही (द्योतमप्रकाशम) करती है, प्रतीत होती है। 'तोक' क्या ? पुत्र । क्यों व्यथा अर्थ में 'तुद्' (तु० उ०) कर्मवाच्य धातु से है, क्यों कि-शासन करते हुये पिता से नित्य ही व्यथित किया जाता है,-'ऐसा कर' 'ऐसा मत कर'। 'तनय' क्या ? पौत्र (पोता)। क्यों ? यह विस्तार अर्थ में 'तन्' (त० उ०) धातु से है। क्यों कि-वह पितासे बहुतही तत या विस्तृत = फैला हुआ होता है। यद्यपि 'तोक' और 'तनय' शब्द दोनों ही अपत्य = सन्तान के वाचक पर्याय शब्द हैं, तथापि एक वाक्य में दोनों के आजाने से इनका भिन्न अर्थ कल्पित किया गया है। भाष्यकार की इस रीति (न्याय) का अन्यत्र भी पर्याय शब्दों में ध्यान रखना चाहिये।