निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३६६ ) १० अ० १ पा० ७ खं० सम्बन्ध से सभी देवता द्य स्थान हैं सभी देवताओं का द्युलोक स्थान समान है। कर्माधिकार स्थान तो अग्नि का पृथिवी, इन्द्र का अन्तरिक्ष और आदित्य का द्युलोक है। ऐसे ही रुद्रदेवता का कर्माधिकार तीनों लोकों में भी बताया हुआ है - “नमोऽस्तु रुद्रेभ्यो ये दिवि येषां वर्षमिषवः । ” ( य० वा० सं० १६, ६४) अर्थात्- जो रुद्र द्युलोक में रहते हैं, और जिनका वृष्टि ही वाण हैं,-जो वृष्टि अतिवृष्टि आदि क्लेशों के द्वारा प्राणियों को मारते हैं, उन रुद्रों के लिये नमस्कार है । वृष्टिकर्म द्य लोक से होता है, और द्य लोक में ही रुद्रों की स्थिति तथा वृष्टि ही उनके आयुध हैं, इस प्रकार इस मन्त्र में रुद्रों का कर्माधिकार स्थान द्युलोक कहागया । “नमोऽस्तु रुद्रेभ्यो येऽन्तरिक्षे येषां वातइषवः।” [ य० वा० सं० १६, ६५ ] अर्थात्-जो रुद्र अन्तरिक्ष में रहते हैं, जिन के वायु ही आयुध हैं, कुवायु से अन्न को नाश करके अथवा वायु रोग को उत्पन्न करके प्राणियों को मारते हैं, उन रुद्रों के अर्थ नमस्कार हो । वायु का अन्तरिक्ष स्थान प्रसिद्ध है । “नमोऽस्तु रुद्रेभ्यो ये पृथिव्यां येषामन्नमिषवः । ” [ य० वा० सं० १६,६६ ] । अर्थात्-जो रुद्र पृथिवी में रहते हैं, जिनके अन्न ही आयुध = शस्त्र हैं, जो कदन्न [सड़े अन्न] के भक्षण में जनों को प्रवृत्त करके अथवा चोरी में प्रवृत्त करके उन्हें रोगी करके मारते हैं उन रुद्रों के अर्थ नमस्कार हो इस सब कथन का सार यह है कि-सब देवताओं का