निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (२६८) १० अ० १पा० ८ खं०
इन्द्ते वा ऐश्वर्यकर्मणः । इन्धन्-शत्रूणां दारयिता वा, द्रावयिता वा । आदरयिता वा यज्वनाम् । तस्य-एषा भवति- ॥ ८ ॥ अर्थः—" जरा बोध० " इस ऋचा का शुनः शेप ऋषि है । " अश्वं न त्वा वारवन्तम्० " ( ऋ० सं० १ मं० ६ अ० ४ सू०) इस सूक्त में प्रातरनुवाक में विनियोग है । हे भगवन् ! अग्ने ! रुद्र ! 'जरा' ( स्तुतिः ) जो यह तेरी स्तुति मुझसे उच्चारण की जा रही है, ( ताम् ) उसको (बोध ) जान । अथवा हे 'जराबोध !' ( तया बोधयितः ! ) उस स्तुति के द्वारा होतृ कर्म में वर्त्तमान हुआ यजमानों के अभिमत अर्थ को सम्पादन करने वाले ! = सिद्ध करने वाले ! 'यजिष्ठाय' यज्ञ के करने वाले 'विशे-विशे' ( मनुष्याय मनुष्याय ) मनुष्य मनुष्य के लिये अथवा ( मनुष्यस्य मनुष्य- स्य यजनाय ) मनुष्य मनुष्य के यजन के अर्थ 'तत्' वह 'वि- विड्ढि ' (कुरु) कर—जो तेरा यज्ञ में कर्त्तव्य है । उससे वह मनुष्य देवताओं के स्तोता तुझ रुद्र के लिये 'दृशीकम्' (दर्शनी- यम् ) दर्शनीय या श्रवणीय 'स्तोमम्' स्तोत्र को (करिष्यति) करेगा । “ यो अग्नौ रुद्रो यो अप्स्वन्तर्य ओषधीर्वी- रुध आविवेश । य इमा विश्वा भुवनानि चाक्ल- पे तस्मै रुद्राय नमो अस्त्वग्नये ॥ ” ( अथ० सं० ७, ८७, १ ] ॥