निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २८४ ) १० अ० १ पा० २ खं० वह गर्भ आठ मास में पकजाता है और वर्षा काल को प्राप्त होकर प्रसव = वरसने के अर्थ समर्थ होता है । जैसाकि कहा है- “वान्ति पर्णशुषो वाताः ततः पर्णमुचोऽपरे । ततः पर्णरुहो वान्ति ततो देवः प्रवर्षति ॥” अर्थात् पहिले पत्तों के सुखाने वाले वायु चलते हैं, फिर पत्तों के गिराने वाले, फिर पत्तों को लगाने वाले और फिर देव वर्षा करता है । इस क्रम में पहिले वायु का ही प्रयोजन होता है, इसी से 'वायु' नाम पहिले समाम्नाय में पढा गया है। और इसीसे यह ठीक कहा गया है कि- “तासां वायुः प्रथमागामी भवति” उनमें 'वायु' पहिले आता है ॥१॥ (खं० २) निरु०-वायवायाहि दर्शतमे सोमा अरङ्कृताः। तेषां पाहि श्रुधी हवम् ॥” (ऋ०सं०१,१,३,१) ॥ वायो ! आयाहि दर्शनीय ! इमे सोमा 'अरङ्कृताः' अलङ्कृताः तेषां पिव, शृणु नो ह्वानम्-इतिकम्- अन्यं मध्यमाद् एवम्- अवक्ष्यत् । तस्य एषा अपरा भवति ॥२॥ अर्थः- “वायवायाहि०” इस ऋचा का मधूच्छन्दस् ऋषि है । आध्वर्यव ('अध्वर्यु' के ) कर्म में वायव्य के उप- स्थान में विनियोग है । तथा बाहूच्य (होता) के प्रउग शस्त्रों इसका शंसन है ।'