भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1049, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 1049

हिन्दी निरुक्त (२८३) १० अ० १ पा० १ खं० उस 'वायु' की यह ऋचा है -॥१॥ व्याख्या। "देवताः" यह बहुवचन भेद पक्ष में है- याज्ञिकों के मत में बहु देवता हैं, उन्हीं के मत से यह बहुवचन है। नैरुक्तों के मत में मध्य स्थान का एक ही देवता है। क्यों कि वे तीन लोकों के कुल एक १ करके तीन ही देवता मानते हैं, इस कारण मध्य लोक का एक ही देवता होसकता है। इन के मत में मध्य लोक के एक देवता के ही ये सब ३२ + ३६ कुल ६८ वायु आदि नाम हैं। एक ही देवता के गुणों के भेद से न्यारे २ नाम होते हैं। जैसे- 'वाति' चलता है, इससे मध्य देव 'वायु' है, फिर मेघजाल से आकाश को आवरण कर लेता है, इससे 'वरुण' है, फिर रोदन करने से 'रुद्र' है, फिर इरा (जल) को देने से 'इन्द्र' है, और फिर वह रसों कोमार्जन इकट्ठो करता है इससे 'पर्जन्य' है। यही गुणों के भेद से नाम भेद की कल्पना है। इसी रीति के अनुसार वायुः (१) वरुणः (२) रुद्रः (३) पर्जन्यः (४) इत्यादि समाम्नाय में देवता नामों की आनुपूर्वी है। यद्यपि 'इन्द्र' यह मध्य स्थान का मुख्य नाम है, इससे समाम्नाय में इसी का प्रथम पाठ होना चाहिये था, किन्तु मध्य स्थान की प्रतीति = कार्यज्ञान वर्षा के द्वारा ही होती है, और उस कर्म में वायु का ही प्रथम अधिकार है, इससे 'वायु' नामका ही पहिले समाम्नान हुआ है। अर्थात्-कार्तिक मास से पीछे सब दिशाओं के जलको ओषधि वनस्पति और जलाशयों से लेता हुआ अन्तरिक्ष में गर्भ को धारण करता है

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