निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ
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अथ दशमाध्यायस्य प्रथमः पादः । ( अथ मध्यस्थानदेवताः )
- ( अथ द्वात्रिंशत् [३२]पदानि ) निघं०—वायुः ॥१॥ वरुणः ॥२॥रुद्रः ॥३॥इन्द्रः ॥४॥ पर्जन्यः॥५॥ बृहस्पतिः ॥६॥ ब्रह्मणस्पतिः ॥७॥ निरु०- अथातो मध्यस्थाना देवताः , तासां वायुः प्रथमागामी भवति । 'वायुः' वाते र्वा । वेते र्वा स्याद् गतिकर्मणः । एतेः,- इति स्थौलाष्ठीविः । अनर्थको वकारः । तस्य एषा भवति ॥ १ ॥ अर्थः- "अथातो०"यहाँ से पृथिवी स्थान देवताओं के अनन्तर मध्यस्थान- जिनका मध्य = अन्तरिक्ष स्थान है, वे वायु आदि देवता कहे जावेंगे । उनमें ' वायु ' सब से प्रथम आने वाला (मुख्य) है । 'वायु' [१] कैसे ? 'वा' गति गन्धनयोः [ अदा० प० ] धातु से है । क्यों कि- वह निरन्तर गमन करता है । अथवा गति अर्थ में 'वी' (अदा० प०) धातु से है । अथवा गति अर्थ में 'इ' (ण) (अदा० प०) धातु से है,यह स्थौलाष्ठी- वि आचार्य मानते हैं । इस पक्ष में 'वायु' शब्द में 'व' कार अनर्थक है ।