निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 1078, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३१३ ) १० अ० १ पा० ३ खं० तस्य एषा भवति ॥३ (१६)॥ अर्थ:-"क्षेत्रस्यपते०" इस ऋचा का भी वामदेव ऋषि है। विनियोग महाव्रत में है। अदिति के लियेचरुरूप चारवार स्तनग्रह होता है, उसका तृतीय स्तनग्रह इस ऋचा से ग्रहण किया जाता है । 'क्षेत्रस्य पते !' हे क्षेत्रपति देव ! 'धेनुः' गौ 'पयः'- इव दूध को जैसे [ त्वम् ] तू ' अस्मासु' हमारे लिये 'मधुमन्तम्' मिठास वाले 'मधुश्चुतम्' मिठास के झरने वाले , घृतम्-इव सुपूतम्' घृतके समान सुन्दर निर्मल = निर्दोष 'ऊर्मिम्' जल समूहको 'धुक्ष्व' दुह या दे = बरस । 'ऋतस्य' जलके 'पतयः' (पातारो वा पालयितारो वा ) स्वामी या अधिष्ठाता क्षेत्र पति आदि देवता 'नः' हमें 'मृळयन्तु ' ( रक्षन्तु ) रक्षाकरें ( पूजयन्तुवा ) अथवा सत्कार करें ॥ ' मृळयति ' ( मृल-खिच् ) धातु अथवा उपद्या अर्थ में अथवा पूजा अर्थ में है ॥ “तद्यत्समान्यामृचि०” सो-जो पद समानी = समान या एक ऋचा में समान अर्थ को कहता है-दूसरे पद से ऋचो के पूर्वार्द्ध में जो कुछ अर्थ कहा गया है,उसी अर्थ को ऋचा उत्तरार्द्ध में जो पद कहता है, वह पदजामि होता है । यहएक मत है । जैसे उक्त मन्त्र में “मधुमन्तम्” “मधुश्चुतम्” [ये दो पद हैं ।] [क्यों कि— जो 'मधुश्चुत्' मधु का चुवाने [मधुको बरस ने वाला] होता है, वह अवश्य ही 'मधुमान्' मधुवाला होता है । इससे यहां “ मधुश्चुतम् ” यह पद 'जामि' होता है ।