निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३१६ ) १० अ० २ पा० ३ खं० 'जामि' नाम पुनरुक्त का है। इसको लोक में दोष कहा जाता है। यह नहीं माना जा सकता कि जो एक स्थान में दोष रूप हो वह दूसरे स्थान में भी दोष ही होवे । अतः वेदके लिये यह कोई आक्षेप नहीं, कि उसमें जामि या पुनरुक्त शब्द आते हैं ? सुतराम् मन्त्रों में ऐसे शब्दों को जामि कहने में कोई हानि नहीं । यह जामि या पुनरुक्त दो प्रकारका होता है एक समानशब्दार्थ और दूसरा असमान शब्दार्थ । जो एक ही पद एकही वाक्य में फिर कहा जावे, वह समान शब्दार्थ है । जैसे- "मन्मरे जति रक्षो हा मन्मरेजति" [ ऋ० स०२, १, १७, १) (निरु० १० अ० ४ पा० ५ खं०)। ऐसे ही जो पद पूर्व पद से भिन्न आकार का-भिन्न अक्षरों वाला और उसी के समान अर्थ वाला हो, वह दूसरा असमान शब्दार्थ जामिपद है। जैसे पूर्वोक्त मन्त्र में "मधुमन्तम्" "मधुश्चुतम्" । इस उभयविध या दोनों ही प्रकार के जामि के मत भेद से दो लक्षण हैं। उनमें प्रथम लक्षण "तद्यत्समान्याम्" इस पङ्क्ति से बताया गया है। और दूसरा लक्षण "यदेवं समाने पादे" इस पङ्क्ति से। इन दोनों लक्षणों के साथ जो उदाहरण मूलमें दिये हैं, वे दोनों ही-(१)"मधुमन्तम्" "मधुश्चुततम्" (२) "हिरण्यरूपः स हिरण्यसंदृक्" असमान शब्दार्थहैं यद्यपि यहां असमानशब्दार्थ जामिके समान समानशब्दार्थ जामिका भी दोनों मन्त्रोंमें उदाहरण संभव था । तथापि उसके लिये इसी अध्यायके चतुर्थ पादके ५ वें खंडमें