निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजामि पदके अर्थान्तरकी कल्पनाके असंभव स्थलमें समाधाना- न्तर भी वक्तव्य है, अतः यहां वह नहीं दिया । वह समाधान उक्त स्थलमें “अभ्यासे भूयांसमर्थं मन्यन्ते” इस पङ्क्ति पर देखना चाहिये । इन दोनों मतों के अनुसार इन का भेद यही है कि-पहिले उदाहरण का पहिला पद ऋचाके पूर्वार्द्धमें है, और दूसरा उसका पद ऋचा के उत्तरार्द्ध में है। एवम् दूसरे उदाहरण के दोनों पदएक ऋचाके एकही पादमें हैं। पहिले मतमें एक ऋचामें एक पर्याय के पीछे दूसरा पर्याय समान पादमें वा भिन्न पादमें, तथा अन्य पद के व्यवधान से या अव्यवधान से आवे वह जामि है। इसी प्रकार दूसरे मतमें-‘एक ऋचाके एकही पादमें जोसमानार्थक पद आता है वह जामि है। जामिता दोषका परिहार । हमारे आचार्यका अभिमान है कि- मन्त्रोंमें जामितादोष आही नहीं सकता, तथापि जिन पूर्वाचार्यों ने अपने २ मतों के अनुसार जामिता दोष मन्त्रों में स्वीकार किया है, उनके मतों का खण्डन भी छात्रों की व्युत्पत्ति के लिये अपेक्षित है इसी से आचार्य उन मतों का उपन्यास करके उनका खण्डन करना चाहते हैं। इससे आपने उन मतों की स्थापना अप- ने ग्रन्थ में जिस प्रकार से की है, उससे भी पूर्व मत का उत्तर मत से खण्डन होजाता है, यह सूचित करते हैं । तथा इससे यह भी सौलभ्य होता है कि— हमारा एक विपक्षी दूसरे विपक्षी से ही परास्त होजाता है, इससे हमको दोनों पक्षों के निवारण का उपाय न करके एक ही का निवारण करना अवशिष्ट रह जाता है। प्रथम मत के ऊपर दूसरे मत की प्रवृत्ति इस अभिप्राय से हुई कि—