निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३१६ ) १० अ० २ पा० ३ खं० भगवद् दुर्गाचार्य ने एक चौथे नवीन पण्डितों के मत का भी उपप्रदर्शन कराया है। वे कहते हैं कि—अभीष्ट वाक्यार्थ की पूर्त्ति होने के पश्चात् जो अधिक पद (जामि) मन्त्र में आता है, वह निपात के समान पाद् पूरण है—छन्द की पूर्त्ति के लिये है, यही उसका प्रयोजन है, इससे वह सर्वथा अनर्थक नहीं, और न वह वाक्य को ही दुष्ट करता है। किन्तु हमारी समझमें पदको निस्सार समझने की अपेक्षा उससे किसी रसका दोहन करना ही उत्तम है। अतः आचार्य पक्ष (तीसरा मत) ही माननीय है । तीसरे मत का उपदर्शित उदाहरण और उसकी व्याख्या— “मण्डूका इवो०”इत्यादि। “योगक्षेमं व आदायाहं भूयासमुत्तम आवो मूर्द्धानमक्रमीम् । अधस्पदन्म उद्गदत मण्डूका इवोदकान्मण्डूका उदकादिव॥”[ऋ०सं०८,८,२४,५] इस ऋचा का ऋषभ ऋषि है। देवता इच्छा से कल्पित किया जासकता है। शत्रुओं से कहा जाता है— (हे विद्विषः !) हे शत्रुओं ! ‘अहम्’ मैं ‘वः’तुम्हारे ‘यो- गक्षेमम्’ होने वाले लाभों को और प्राप्त किये हुये अर्थों को ‘आदाय’ लेकर या अपने अधीन करके ‘ उत्तमः ’ तुम्हारा मुख्य ‘भूयासम्’ हो जाऊं । “आवोमूर्द्धानम् अक्रमीम्” तुम्हारे मस्तक को आक्रमण करके- दबा करके मैं स्थित हो जाऊं । तुम सब मुझ से सदा ही दबे हुये मस्तक रहो । 'मे’ (मम) मेरे ‘अधस्पदात्’पैरों के नीचे रहते हुये तुम सब ‘उद्गदत्’ बोलते रहो- मेरे मुख की ओर ताकते हुये अपने सब स्वार्थों