भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1085

हिन्दी निरुक्त (३२०) ९० अ० २५१० ३ खं०

को पराधीन कियेहुये नित्यही बोलते रहो। कैसे—"मण्डूका इवोदकात्” जैसे जल के विना मेंढुक नित्य अस्त्राधीन वृत्ति होते हुये निर्वचन (मूक) होजाते हैं, ऐसे ही मेरे विना तुम्हारी स्थिति न हो। इस प्रकार यहां पहिले स्थान में 'मण्डूकाः' यह शत्रुओ' के वाक् हीन होने में उपमान है। “मण्डूका उदकात्- इव” और इस दूसरे स्थान में जिस प्रकार जल के विना मण्डूक (मेंढक) सर्वथा ही नहीं होते इसी प्रकार तुम मेरे विना मत हो, इस प्रकार यहां अपना (वक्ता का) उदक उपमान है। इसी प्रकार पूर्व मन्त्रों में भी विशेष का अनुसन्धान करना जैसे- कोई मधुमान (मधुवाला) होता है, किन्तु वह निरन्तर पुनः पुनः मधु (शहद) को चुवाता नहीं, इससे वह 'मधुश्चुत्' (मधुका चुवाने वाला) नहीं कहा जाता। सुतराम् 'मधुमान्' और 'मधुश्चुत' शब्द दोनों भिन्न २ अर्थ वाले ही हैं। यहां जामिता दोष नहीं आता। और ऐसे ही "हिरण्यरूपः स हिरण्य संदृक्” यहां कोई हिरण्य (सुवर्ण) रूप होता है, किन्तु वह हिरण्य जैसा दिखाई नहीं देता और न प्रिय होता है। इससे 'हिरण्यरूप' वह है, जो हिरण्य (सुवर्ण) ही हो, और 'हिरण्य संदृक्' वह है, जो हिरण्य जैसा दिखाई देवे और हिरण्य न हो। ऐसे ही अन्यत्र भी मन्त्रों में शब्दों के भिन्न २ अर्थ अनुसन्धान करके जामिता दोष के अभाव को देखना। जहां मन्त्रों में ऐसा स्थल आता है, वह पुरुष की बुद्धि के दोष से ही दोष युक्त प्रतीत होता है; मन्त्र में सर्वथा ही दोष नहीं होता। यह भाष्यकार का अभिप्राय है॥