भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 1282 में से

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का है। ये दोनों ही वेदाङ्ग, शब्दके अनुशासनसे मुख्य प्रयोजन रखते हैं, इसीसे कुछ कुछ शब्दोंमें नैरुक्तोंका वैयाकरणोंके साथ ऐकमत्य तथा कहीं कहीं वैमत्य होना स्वाभाविक है। क्योंकि अपने अपने व्याकरणोंमें शब्दोंक अनुविधान या अनुशासनका क्रम भिन्न भिन्न रखते हैं। जैसे-पाणिनोय्य लोग 'भू' प्रकृति [ धातु ] लेकर उससे लट् प्रत्यय लगा कर तथा उसके 'अ' 'ट्' को खोकर शुद्ध 'ल्' के स्थानमें 'तिप्' आदि आदेश करते हैं, ऐसो ही रीतिसे वे अपने शास्त्रमें 'भवति' पदको साधन कर सकते हैं। एवम् अन्य वैयाकरण लट्के विना किये ही 'भू' से 'तिप्' आदिका योग करके 'भवति' पदको सिद्ध कर लेते हैं। उनके मतमें "लट्को पढ़ना और फिर उसका लोप करना"—और इन दूसरोंके मतमे "लट्के बिनाही तिप् आदि प्रत्ययोको ले लेना"—ऐसी ऐसी व्यवस्थाओंका उनके शास्त्रोंमें शास्त्र-शैलीके अतिरिक्त अन्य कोई प्रयोजन नहीं है। क्योंकि-सबका लक्ष्य 'भवति' पदका साधन ही है। गार्ग्य मुनि कहते हैं कि--शब्दोंके अनुशासनमें आचार्योंके- विविध उपायोंकी दल दलको देखकर शाकटायन आचार्यने सब नामोंके आख्यातज होनेकी प्रतिज्ञाको पालन करनेके लिये बेजोड काम भी करडाला है अर्थात् कहीं एक नामको अनेक धातुओसे बनाते हैं और कहीं एक नामको एक ही धातुसे जो कि अन्य व्याकरणोंमें अप्रसिद्ध है, किन्तु ऐसा करने पर भी शब्द अपने अर्थके पीछे नहीं चलता। इसीसे वह इस कृत्यके लिये पाणिन्यादि आचार्योंके आक्षेपभाजन बनते हैं। इसके अतिरिक्त शाकटायन अपनी प्रतिज्ञाको बहती हुई देखकर किसी किसी शब्दमें जब देखते कि -- जिस क्रियासे द्रव्य परिचित होता है, उस क्रियाके वाचक धातुका व्याख्येय शब्दमें प्रवेश नहीं होता ; तब नदीमें बहते हुए के तृणावलम्बनके समान पूरे पूरे आख्यात पदोंसे उनके अर्द्ध अर्द्ध