निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०८ अ० १ पा० ४ ख० २ । वस्तुके अनेक क्रियाओंके सम्बन्धसे अनेक नाम होंगे । इससे सब नाम आख्यातसे उत्पन्न नहीं हैं। ४र्थ दोष-जबकि-सभी नाम आख्यात या धातुओंसे उत्पन्न हैं, तो क्यों नहीं सभी द्रव्य [ वस्तु ] ऐसे नामोंसे बोले जांय, जिनमें व्याकरण शास्त्रके न्यायसे संस्कार सिद्ध हो, तथा जिनसे उन वस्तुओंकी क्रिया स्पष्टरूपसे प्रतीत हो । अर्थात् जैसे-पाचक, लावक आदि शब्द व्याकरणसिद्ध तथा प्रतीतक्रिय हैं, वैसेही पुरुषको 'पुरिशय' कहेंगे, क्योंकि वह पुरीमें शयन करता है और वह ऐसा करनेसे प्रतीतक्रिय होताहै, ऐसेही अश्वको 'अष्टा' कहेंगे, क्योंकि वह अशन करता है, तथा तृणको 'तर्दन' कहेंगे, क्योंकि विना ही कारणके पुरुष आदि वस्तुओंको जिन नामोंसे उनकी क्रिया प्रतीत न हो उनसे [ पुरुष, अश्व आदिकोंसे ] बोलना न्यायसङ्गत नहीं है। ५ म दोष-शाकटायनादि आचार्य शब्दका प्रयोग करके, उसको सामने करके विचारते हैं कि-“यह किस धातुसे बना है।” जैसेकि प्रथन [ फैलाने ] क्रियाके सम्बन्धसे 'पृथिवी' नाम है। किन्तु हम पूछते हैं, कि-यदि इसका क्रियाके सम्बन्धके विनाही स्वाभाविक 'पृथिवी' नाम है, तो नहीं फैलनेवालीको किसने फैलाया ? यदि मानें कि-“ऐसी अवस्थामें भी किसीने इसका प्रथन किया ही है” तो प्रश्न उठता है-“प्रथन करनेवालेने किस आधार पर बैठकर प्रथन किया” क्योंकि-पृथिवी ही सर्व प्राणियों का आधार है और अनाधार पुरुषसे इस पृथ्वीका प्रथन शक्य नहीं। इससे प्रथन क्रियाका अभाव ही सिद्ध हुआ और प्रथनके अभावमें “सब नाम क्रियासे उत्पन्न हैं” यह सिद्धान्त भी अयुक्त ही हुआ। इससे “सब नाम आख्यातसे उत्पन्न नहीं हैं”। • ६ष्ठ दोष-वेदके जितने अङ्ग हैं, उनमें प्रत्येकके अनेक भेद हैं। इस रीतिके अनुसार निरुक्त १४ प्रकार और व्याकरण ८। प्रकार-