निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ,१० इन्हीं शब्दोंको कोई आचार्य संविज्ञातपद कहते हैं। गार्ग्य आचार्य्य कहते हैं कि-जब डित्थ, डवित्थ आदि शब्दोंमें धातु- ओंकी कल्पना भी नहीं की जासकती तो सब शब्दोंको आख्यात- से उत्पन्न मानना भूल ही है, अर्थात् शाकटायनके मतमें यह पहिला अव्याप्तिरूप दोष है। २रा दोष यह है कि-यदि सब शब्दोंको उत्पत्ति आख्यातसे मानेंगे तो जो कोई सत्त्व या प्राणी उस कर्म अथवा क्रियाको करेगा, सभी उस तरह बोला जायगा। जैसे-जो कोई भी मार्गको अशन या व्यापन करेगा वही 'अश्व' कहलाएगा, तथा जो कोई भी तर्दन करेगा, वही तृण कहा जायगा। अर्थात् एक कर्मके करनेवाले सभी प्राणी एक नामसे बोले जाने चाहिएं, किन्तु अश्व उस क्रियाको नहीं करनेकी अवस्थामें भी अश्व कहा जाता है, और अन्य प्राणी उस क्रियाको करनेसे भी अश्व नहीं कहे जाते। जब कि-इसमें कोई विशेष हेतु नहीं है, तो मानना होगा कि-अशन क्रियाके अभिप्रायसे अश्व को अश्व नहीं कहा ' जाता, अपि तु क्रियाकी अपेक्षा न रखकर अर्थके बोधनके लिये यह शब्द व्यवहार मात्र है, इससे सब नाम आख्यातसे उत्पन्न नहीं हैं। ३य दोष-जिस द्रव्यमें जितनी क्रियाओंका सम्बन्ध होगा, उतने ही उसके नाम होंगे। क्योंकि-वर्त्तमान क्रियाओंमेंसे कुछ क्रिया- ओंके त्याग करने एवम् कुछ क्रियाओंके स्वीकार करनेका कोई विशेष कारण नहीं है। जैसे कि-स्थूणा (खम्भी) एक ही, दरमें शयन करनेसे 'दरशया' तथा उसमें बांस सञ्जन किया (पोया- जोड़ा) जाता है, इससे 'सञ्जनी' भी कही जावेगी, किन्तु वह इन नामोंसे बोली नहीं जाती है। अर्थात् शाकटायनके सिद्धान्तानुसार अनेक वस्तु एक क्रियाके सम्बन्धसे एक नामवाले होंगे, और एक