भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 106

१०६ अ० १ पा० ४ ख० २। 'अपरस्माद् भावात् पूर्वस्य प्रदेशो नोपपद्यते ?'—इति नोपपद्यते ॥ २ ॥ (चतुर्थः पादः) अबसे पहिले आख्यात, नाम, उपसर्ग और निपात ये चारों पद क्रमसे व्याख्यापूर्वक वर्णन किये गये हैं, [किन्तु पूर्व प्रतिज्ञाके अनुसार नामका कुछ अंश अब निरूपण किया जाता है ] शाकटायन और गार्ग्यवर्जित सब नैरूक्तोंका सिद्धान्त है कि—"सभी नाम सामान्य रूपसे आख्यातसे उत्पन्न हुए है ।" गार्ग्य और कोई कोई वैयाकरण पूर्वमतके विपक्षमें ऐसा मानते हैं कि—"सब नाम आख्यातसे उत्पन्न नहीं है।" गार्ग्यके मतका स्पष्टीकरण । गार्ग्यके मतमें नामोंके (३) तीन विभाग हैं,—प्रत्यक्षक्रिय, प्रकल्प्यक्रिय और अविद्यमानक्रिय । कारकः, हारकः इत्यादि प्रत्यक्षक्रिय, गौः, अश्वः इत्यादि प्रकल्प्य क्रिय तथा डित्थः, डवित्थः, अरविन्दः, अर्वाङ्, चन्द्रः इत्यादि नाम अविद्यमानक्रिय हैं। अर्थात् जिन नामोंमें उदात्त आदि स्वर एवं प्रकृति, प्रत्यय आदि रूप संस्कार दोनों लक्षण शास्त्रमें विहित उपपत्तिसे युक्त हो तथा उन धातुओंमे, जिनकी वाच्यक्रियाओंसे वे नाम प्रतिष्ठित माने गये हों, अनुगत हों, वे नाम आख्यातज हैं। इन्हींको कोई आचार्य्य संविज्ञात या संविज्ञान पद कहते हैं। जिन गौः, अश्वः इत्यादि नामोंमें क्रियाकी साक्षात् प्रतीति नहीं होती है किन्तु कल्पना की जा सकती है वे प्रकल्प्यक्रिय नाम होते हैं। एवम् जिन डित्थः, डवित्थः इत्यादि नामोंमें क्रियाकी कल्पना भी नहीं हो सकती, वे अविद्यमानक्रिय या रूढ़ि शब्द कहाते हैं।