निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३३३ ) १० अ० २ पा० ८ खं०
समानो वां जनिता भ्रातरा युवं ) यमा विहेह मातरा ॥ ” (ऋ०सं ४, ८, २५,२)॥ इस ऋचाका भारद्वाज ऋषि है । बृहती छन्द है । 'बत्' (बट्) यह सत्य का नाम है। हे 'इन्द्राग्नी !' इन्द्र अग्नि देवो ! 'बट्' सत्यही 'इत्था' इस प्रकार की 'महिमा' तुम्हारी बड़ाई है, [ जैसी कि इस सूक्त में वर्णन कीगई है । ] 'आ- पनिष्ठः' सबसे अधिक स्तुति करने योग्य है । 'वाम्' (युवयोः) तुम दोनों का 'समानः' समान ही (एक सूर्य देव) 'जनिता' पिता है। इससे 'युवम्' तुम दोनों 'यमौ' जोड़ले 'भ्रातरौ' भाई हो 'इह-इह' यहां (पृथिवी लोक में) यहां (अन्तरिक्ष लोक में) 'मातरा' (मातरौ = निर्माणतारौ) सब लोक के निर्माण करने वाले तुम्हीं दोनों हो । यहां पर सूर्य के दो पुत्र यम (जोड़ले) अग्नि और इन्द्र ही होसकते हैं, क्योंकि-तीसरी द्युलोक की ज्योति से अतिरिक्त ये ही दो ज्योतिषिएँ हैं, इस कारण इस लोक का यम पार्थिव अग्नि ही हुआ, तथा “यमोह जातः” इस मन्त्र में 'यम' शब्द से पार्थिव अग्नि का ग्रहण ठीक ही है । 'मित्र' (१३) क्यों ? 'प्रमीतेः त्रायते' वर्षा करके सबका प्रमीति (मृत्यु) से त्राण करता है, इससे मित्र है । 'प्रमीति' शब्द से 'मि' और 'त्रायते' शब्द से 'त्र' लेकर 'मित्र' शब्द बनता है । अथवा 'संमिन्वानो द्रवति' जलसे गीला करता हुआ चलता है, इससे 'मित्र' है । यहाँ पहिले पद से 'मि' लेकर 'मित्र' शब्द बना है । अथवा स्नेहन अर्थ में 'मिद्' (भ्वा० आ०) धातु से है। क्योंकि-वह सबको जलसे स्नि-