निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३३२) १० अ० २ पा० ८ खं० जाता है, और गृह में वे तत्प्रधान ( अग्निप्रधान ) होती हैं, विशेष रूप से अग्नि की रक्षा के लिये उसी की सेवा में रहती हैं। और अग्नि के समीप ही वे व्रत का ग्रहण करती हैं और व्रत के त्यागसे पूर्व अग्नि के ही परतन्त्र (पराधीन) रहती हैं। “तृतीयो अग्निष्टे पतिः ” अर्थात्-हे कन्ये ! तीसरा तेरा पति अग्नि है, यह भी निगम है। 'तम्' उस 'वा' ( अनर्थक ) 'ऋद्धम्' ( सन्निद्धं भोगैः ) भोगों से सम्पन्न या भोगों के ईश्वर यम अग्नि को 'चराथा' ( चरन्त्या पश्वाहुत्या ) चलती हुई (जङ्गम) पशुरूप आहुति से 'वसतया' ( निवसन्त्या औषधाहुत्या ) स्थावर या न चलने वाली औषधरूप आहुति से 'गावः' गोएं 'शस्तम्' (गृहम् ) घरको ' न ' ( इव ) जैसे 'नक्षन्ते' प्राप्त होती हैं, वैसे ही 'वयम्' हम ( प्राप्त होवें ] ये ऋचाएं द्विपदा (विराट्- छन्द ) हैं । यहां 'यम' शब्द से पार्थिव अग्नि लिया गया है, उसका निगम- “यमो ह जात इन्द्रेण सह संगतः ” अर्थात्- यम उत्पन्न होकर इन्द्र के साथ मिला । क्योंकि- पार्थिव अग्नि उत्पन्न होकर ऊपर को चलता है, और अन्तरिक्ष के ज्योति के साथ मिल जाता है, इस से यहां ' यम ' शब्द से पार्थिव अग्नि ही ग्रहण किया जा सकता है। दूसरा स्पष्ट निगम— (“बलिन्था महिषानामिन्द्राग्नी पणिह आ ।