निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३३१ ) १० अ० २ पा० ६ सं० ऋषि है। ये द्विपदा विराट् छन्द हैं। प्रातरनुवाक और आश्विन में विनियोग है। अग्नि देव की अर्चिष् या किरण 'सेना-इव' सेना के समान 'सृष्टा' निश्चित की हुई या सेनापति से प्रेरित हुई सेनाके समान 'भयम्' ( भयं वा ) शत्रुओं के लिये भयको 'दधाति' धारण करती है ( बलंवा ) अथवा भक्तों के लिये बलको धारण करती है। 'अस्तुः-न' ( क्षेप्तुः ) फेंकने वाले के जिस 'दिद्युत्-इव' आयुध के समान 'त्वेष-प्रतीका' शत्रुओं के लिये भयप्रतीका या भयरूप है- दर्शन से ही भयानक है। अथवा अपने भक्तोंके लिये (बलप्रतीका) बलरूप है अथवा (यशः प्रतीका ) यश रूप है अथवा ( महाप्रतीका ) महती बड़ी या पूजनीया दिखाई देती है अथवा (दीप्तदर्शना ) देदीप्य- मान = बहुत प्रकाश रूप दिखाई देती है। “यमो ह जातो यमो जनित्वम्०” । जिसका अर्चिष् या किरण ऐसे चमत्कार वाला है, वह 'यमः' (यमइव ) यम या जोड़ला जैसा अग्नि 'जातः' भूत है 'यमः' यम 'जनित्वं' ( च ) और भविष्यत् जगत् रूप है-जो कुछ अब तक संसार में हुआ और जो कुछ होने वाला है सब वही यम अग्नि है उससे अन्य कुछ नहीं है, किन्तु सब उसी का स्वरूप है। 'कनीनाम्' (कन्यानाम् ) कन्याओ' का 'जारः' ( जरयिता) जरणकरने वाला है वही यम अग्नि कन्याओंकेः कन्योभाव को मिटाने वाला है। क्योंकि-जब अग्नि के समीप कन्याओं का विवाह हो जाता है, तभी उनका कन्यापन मिटजाता है और वे भार्या हो जाती हैं। 'जनीनां' ( जायानाम् ) जायाओं यह भार्याओं का 'पतिः' पति है-पालन करने वाला है। क्योंकि- विवाह के अनन्तर उनका पति के संगसे यज्ञ में अधिकार हो