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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त ( ३३१ ) १० अ० २ पा० ६ सं० ऋषि है। ये द्विपदा विराट् छन्द हैं। प्रातरनुवाक और आश्विन में विनियोग है। अग्नि देव की अर्चिष् या किरण 'सेना-इव' सेना के समान 'सृष्टा' निश्चित की हुई या सेनापति से प्रेरित हुई सेनाके समान 'भयम्' ( भयं वा ) शत्रुओं के लिये भयको 'दधाति' धारण करती है ( बलंवा ) अथवा भक्तों के लिये बलको धारण करती है। 'अस्तुः-न' ( क्षेप्तुः ) फेंकने वाले के जिस 'दिद्युत्-इव' आयुध के समान 'त्वेष-प्रतीका' शत्रुओं के लिये भयप्रतीका या भयरूप है- दर्शन से ही भयानक है। अथवा अपने भक्तोंके लिये (बलप्रतीका) बलरूप है अथवा (यशः प्रतीका ) यश रूप है अथवा ( महाप्रतीका ) महती बड़ी या पूजनीया दिखाई देती है अथवा (दीप्तदर्शना ) देदीप्य- मान = बहुत प्रकाश रूप दिखाई देती है। “यमो ह जातो यमो जनित्वम्०” । जिसका अर्चिष् या किरण ऐसे चमत्कार वाला है, वह 'यमः' (यमइव ) यम या जोड़ला जैसा अग्नि 'जातः' भूत है 'यमः' यम 'जनित्वं' ( च ) और भविष्यत् जगत् रूप है-जो कुछ अब तक संसार में हुआ और जो कुछ होने वाला है सब वही यम अग्नि है उससे अन्य कुछ नहीं है, किन्तु सब उसी का स्वरूप है। 'कनीनाम्' (कन्यानाम् ) कन्याओ' का 'जारः' ( जरयिता) जरणकरने वाला है वही यम अग्नि कन्याओंकेः कन्योभाव को मिटाने वाला है। क्योंकि-जब अग्नि के समीप कन्याओं का विवाह हो जाता है, तभी उनका कन्यापन मिटजाता है और वे भार्या हो जाती हैं। 'जनीनां' ( जायानाम् ) जायाओं यह भार्याओं का 'पतिः' पति है-पालन करने वाला है। क्योंकि- विवाह के अनन्तर उनका पति के संगसे यज्ञ में अधिकार हो

हिन्दी निरुक्त ( ३३२) १० अ० २ पा० ८ खं० जाता है, और गृह में वे तत्प्रधान ( अग्निप्रधान ) होती हैं, विशेष रूप से अग्नि की रक्षा के लिये उसी की सेवा में रहती हैं। और अग्नि के समीप ही वे व्रत का ग्रहण करती हैं और व्रत के त्यागसे पूर्व अग्नि के ही परतन्त्र (पराधीन) रहती हैं। “तृतीयो अग्निष्टे पतिः ” अर्थात्-हे कन्ये ! तीसरा तेरा पति अग्नि है, यह भी निगम है। 'तम्' उस 'वा' ( अनर्थक ) 'ऋद्धम्' ( सन्निद्धं भोगैः ) भोगों से सम्पन्न या भोगों के ईश्वर यम अग्नि को 'चराथा' ( चरन्त्या पश्वाहुत्या ) चलती हुई (जङ्गम) पशुरूप आहुति से 'वसतया' ( निवसन्त्या औषधाहुत्या ) स्थावर या न चलने वाली औषधरूप आहुति से 'गावः' गोएं 'शस्तम्' (गृहम् ) घरको ' न ' ( इव ) जैसे 'नक्षन्ते' प्राप्त होती हैं, वैसे ही 'वयम्' हम ( प्राप्त होवें ] ये ऋचाएं द्विपदा (विराट्- छन्द ) हैं । यहां 'यम' शब्द से पार्थिव अग्नि लिया गया है, उसका निगम- “यमो ह जात इन्द्रेण सह संगतः ” अर्थात्- यम उत्पन्न होकर इन्द्र के साथ मिला । क्योंकि- पार्थिव अग्नि उत्पन्न होकर ऊपर को चलता है, और अन्तरिक्ष के ज्योति के साथ मिल जाता है, इस से यहां ' यम ' शब्द से पार्थिव अग्नि ही ग्रहण किया जा सकता है। दूसरा स्पष्ट निगम— (“बलिन्था महिषानामिन्द्राग्नी पणिह आ ।

हिन्दी निरुक्त ( ३३३ ) १० अ० २ पा० ८ खं०


समानो वां जनिता भ्रातरा युवं ) यमा विहेह मातरा ॥ ” (ऋ०सं ४, ८, २५,२)॥ इस ऋचाका भारद्वाज ऋषि है । बृहती छन्द है । 'बत्' (बट्) यह सत्य का नाम है। हे 'इन्द्राग्नी !' इन्द्र अग्नि देवो ! 'बट्' सत्यही 'इत्था' इस प्रकार की 'महिमा' तुम्हारी बड़ाई है, [ जैसी कि इस सूक्त में वर्णन कीगई है । ] 'आ- पनिष्ठः' सबसे अधिक स्तुति करने योग्य है । 'वाम्' (युवयोः) तुम दोनों का 'समानः' समान ही (एक सूर्य देव) 'जनिता' पिता है। इससे 'युवम्' तुम दोनों 'यमौ' जोड़ले 'भ्रातरौ' भाई हो 'इह-इह' यहां (पृथिवी लोक में) यहां (अन्तरिक्ष लोक में) 'मातरा' (मातरौ = निर्माणतारौ) सब लोक के निर्माण करने वाले तुम्हीं दोनों हो । यहां पर सूर्य के दो पुत्र यम (जोड़ले) अग्नि और इन्द्र ही होसकते हैं, क्योंकि-तीसरी द्युलोक की ज्योति से अतिरिक्त ये ही दो ज्योतिषिएँ हैं, इस कारण इस लोक का यम पार्थिव अग्नि ही हुआ, तथा “यमोह जातः” इस मन्त्र में 'यम' शब्द से पार्थिव अग्नि का ग्रहण ठीक ही है । 'मित्र' (१३) क्यों ? 'प्रमीतेः त्रायते' वर्षा करके सबका प्रमीति (मृत्यु) से त्राण करता है, इससे मित्र है । 'प्रमीति' शब्द से 'मि' और 'त्रायते' शब्द से 'त्र' लेकर 'मित्र' शब्द बनता है । अथवा 'संमिन्वानो द्रवति' जलसे गीला करता हुआ चलता है, इससे 'मित्र' है । यहाँ पहिले पद से 'मि' लेकर 'मित्र' शब्द बना है । अथवा स्नेहन अर्थ में 'मिद्' (भ्वा० आ०) धातु से है। क्योंकि-वह सबको जलसे स्नि-

हिन्दी निरुक्त ( ३३४ ) १० अ० २पा० ८ खं० ग्ध या चिकना कर देता है । यहां भी ‘मिद्’ धातु से ‘भि’ लेकर ‘मित्र’ शब्द की सृष्टि होती है । “तस्य०” उस (मित्र) की यह ऋचा होती है-॥८(२१)॥ व्याख्या दशमाध्याय के आरम्भ से वायु आदि मध्यम लोक के देवताओं के नामों की व्याख्या होरही है । उन्हीमें यह ‘यम’ (१२) शब्द है । इसके मध्यमवाचकत्व में “परेयिवांसम्” यह निगम देकर प्रसंग से इसमें पार्थिव अग्नि की वाचकता भी दिखाने के लिये “अग्निरपि यम उच्यते” “तम्- एता ऋचोऽनुप्रवदन्ति” अर्थात्-‘अग्निभी यम कहाता है, उसको ये ऋचाएं अनुवाद करती हैं,' यह आरम्भ किया है । फिर जो उदाहरण दिये हैं उनमें पार्थिव अग्निमें यमत्व के साधक इस प्रकार हैं-(१) “जारः कनीनाम्” कन्याओं के कन्यापने को मिटाने वाला । यह “यमो ह जातः” मन्त्रमें यम का विशेषण है । क्योंकि-कन्याओं का विवाह संस्कार मध्यम या उत्तम ज्योति से नहीं होता इसीसे पार्थिव अग्नि ही ‘यम’ होता है । (२) “पतिर्जनीनाम्” ‘भार्याओं का पति’ । यह भी उक्त प्रकार से अन्य ज्योतियों में सम्भव नही किन्तु पार्थिव ही में है । (३) “तं वश्चराथा” “वस्त्या” स्थावर और जङ्गम आहुति का सम्बन्ध । (४) “यमोह जातः इन्द्रेण सह संगतः” उत्पन्न हो कर मध्यम ज्योतिसे मिलना । (५) “यमाविहेह” सूर्य के

हिन्दी निरुक्त ( ३३५ ) १० अ० २ पा० ९ खं० दो पुत्र यम । इन में भी एक यम पार्थिव अग्नि ही होता है और इसी मन्त्रमें “इह” यह इस लोक का वाचक पद भी और पुष्ट करदेता है । और (६) “तृतीयोऽग्निष्टे पतिः” अर्थात्—हे कन्ये ! तीसरा तेरा पति अग्नि है। यह निगम “पतिर्जनीनां” के साथ संबाद करके अत्यन्त ही यम शब्द की अग्निवाचकता को सिद्ध कर देता है । इसी प्रकार शब्द के अर्थ को निश्चय करने में अनेक निगमों की सहायता लेनी चाहिये। यह भाष्यकार ने प्रदर्शन किया है । “जारः कनीनाम्” निगम पर ध्यान देने से निश्चय होता है कि-एक बार अग्नि के संनिधान में कन्याओं का विवाहसंस्कार होने के पश्चात् फिर विवाह संस्कार नहीं हो सकता । क्योंकि- जो कन्याभाव जीर्ण होचुका वह फिर नया नहीं होसकता । पुनर्विवाह वेद में ढूंढने वालों को इस निगम पर दृष्टि डालना चाहिये ॥ ८ (२१) ॥ [ खं० ६ ] निरु०- “मित्रोजनान्पातयति ब्रुवाणो मित्रो दाधार पृथिवी मुतद्याम् । मित्रः कृष्टी रनिमिषा- भिचष्टे मित्राय हव्यं घृतवज्जुहोत ॥” ( ऋ० सं० ३, ४, ५, १ ) मित्रः जनान् आयातयति प्रब्रुवाणः शब्दं कुर्वन् मित्रएव धारयति पृथिवीं च दिवं च, मित्रः कृष्टीः अनिमिषन् अभिविपश्यति-इति ।

हिन्दी निरुक्त ( ३३६ ) १० अ० २ पा० ६ खं० ‘कृष्टयः’—इति मनुष्यनाम । कर्म॑वन्तो भवन्ति । विकृष्टदेहा वा॑ । ‘मि॒त्राय॑ ह॒व्यं घृ॒तव॑ज्जुहोत” इति व्याख्यातम् । ‘जुहोतिः’ दानकर्मा । ‘कः’ कमनो वा । क्रमणो वा । सुखो वा । तस्य—एषा भवति ॥१९(२२)॥ अर्थः— “मित्रो जनान्०” इस ऋचा का विश्वामित्र ऋषि है । अववृष्ट होम में प्रायश्चित्त है । अग्निहोत्र में पहिली आहुति में विनियोग है । ‘मित्रः’ मित्र देव ‘ब्रुवाणः’ (शब्दं कुर्वन्) गरजता हुआ ‘जनान्’ मनुष्यों को ‘यातयति’(प्रवर्त्तयति कृषि आदि कर्म में प्रवृत्त करता है । ‘मित्रः (एव)’ मित्र ही ‘पृथिवीं (च)’ पृथिवी को ‘उत—द्याम्’ दिवं (च)और द्युलोक को ‘दाधार’ (धारयति) धारण करता है । ‘मित्रः’ मित्र ही ‘अनिमिषा’ (अन्निमिषन्) पलक न झिपाता हुआ (सदा जाग्रत रहता हुआ) ‘कृष्टीः’ (मनुष्यान्)मनुष्यों को ‘अभिचष्टे’ (अभिविपश्यति देखता है । ‘मित्राय’ ऐसे मित्र देव के लिये (हे मनुष्याः) हे मनुष्यो ! तुम ‘घृतवत्’ घृतयुक्त ‘हव्यम्’ हविः को ‘जुहोत’ होम करो, (यह पहिले व्याख्यान किया जाचुका है) ॥ ‘कृष्टयः’ यह मनुष्य का नाम है । क्यों कि— वे नित्य ही कर्म वाले होते हैं । अथवा वे विकृष्टदेह होते हैं उनके अङ्ग इच्छानुसार फैल सकते हैं, किन्तु अन्य गो आदि पशुओं के नहीं, वे संसृष्ट देह = जुड़े हुये देह वाले होते हैं ।

हिन्दी निरुक्त ( ३३१ ) १० अ० २ पा० ९ खंड 'जुहोति' (जु० प०) धातु दानार्थक है । 'क' (१४)- यह वक्तव्य है। सो यह महान् आत्मा = सर्वात्मा (सबका अन्तर्यामी) ज्ञान स्वरूप देव है । क्यों ? कमन या कामियों के काम्य [ बाञ्छनीय ] अर्थों में साधन होता है। अथवा कमण या स्वयमेव कमण करने वाला होने से 'क' है। अथवा 'क' सुख स्वरूप होने से 'क' है । "तस्य०" उस 'क' देव की यह ऋचा है ॥६[२२]॥ ( खं० १० ) निरु०- हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥* (ऋ० सं० ८, ७, ३, व० १, १०, १०, ९ सू० १)॥ हिरण्यगर्भो हिरण्यमयो गर्भः । हिरण्यमयो गर्भोऽस्य- इति वा । 'गर्भो' गृभेः गृणात्यर्थे । गिरति अनर्थान्- इति वा । यदा हि स्त्री गुणान् गृह्णाति गुणाश्च अस्या गृह्यन्ते अथ गर्भो भवति, समभवद्-अग्रे भूतस्य जातः पतिः एको बभूव, सः धारयति पृथिवीं च दिवं च, "कस्मै देवाय हविषा विधेम" इति व्याख्यातम् ।

हिन्दी निरुक्त ( ३३८ ) १० अ० २ पा० १० खंड०

‘विदधतिः’ दानकर्मा ॥ ‘सरस्वान्’ व्याख्यातः । तस्य एषा भवति ॥१० (२३)॥ अर्थः-“हिरण्यगर्भः” इस ऋचा का हिरण्यगर्भ ही ऋषि है । क्यों कि- वह सर्वात्मक या सर्व रूप है, इससे उसके ऋषि होने पर भी प्रथम पुरुष का योग (समवर्त्तत) विरुद्ध नहीं होता । यदि सर्वात्मकता उनकी न होती तो उत्तम पुरुष होता और यह ऋचा परोक्षकृत न होकर आध्या- त्मिकी ही होती तथा इसमें उत्तम पुरुष की क्रिया होती । अथवा परब्रह्म की जो हिरण्यगर्भ की अवस्था है, जो प्रति- कल्प में आविर्भूत [प्रकट] और तिरोभूत (अन्तर्धान) होती रहती है,और जो बुद्धिपूर्वक- जिससे ईश्वर अपनी इच्छा से ज्ञान पूर्वक रचता है , तथा जो नित्य है, उस नित्य हिरण्यगर्भावस्था में नित्य मन्त्र आश्रयमात्र से अभिधाता या वक्ता [ऋषि] को लेकर प्रवृत्त होता हुआ अनुवाद करता है, वास्तव में नित्य मन्त्र का कोई वक्ता नहीं है, इससे उस मे पुरुष का योग विवक्षित नहीं होता है, अर्थात् उत्तम पुरुष होने पर भी वह ऋचा वैसी ही है, जैसी प्रथम पुरुष के योग में । यदि मन्त्रकृतक = किसी का किया हुआहोता तो नियम से ही यहां उत्तम पुरुष होता ॥ ‘हिरण्यगर्भः’[एव] हिरण्यगर्भ ही ‘भूतस्य’[अस्य उत्पन्न- स्य स्थावरजङ्गमस्य जगतः] इस स्थावर जङ्गम सम्पूर्ण जगत् के ‘अग्रे’ पहिले ‘जातः’ उत्पन्न हुआ ‘समवर्त्तत’ भले प्रकार वर्त्तमान था । और वह पहिले हुआ हुआ, उस पीछे से

हिन्दी निरुक्त (३३६) १० अ० २पा० १०खं० उत्पन्न हुये जगत् का 'एकः' (असपत्नः) अशत्रु या विरोधी से रहित 'पतिः' पालन करने वाला ईश्वर = स्वतन्त्र स्वामी (बभूव) हुआ था। इसी से 'सः' वह 'पृथिवीं' (च) पृथिवी को 'उत' और 'इमाम्' इस 'द्याम्' [दिवम्-च] द्युलोक को 'दाधार' (धारयति) धारण करता है। जिससे कि—वह देवता ऐसे प्रभाव वाला महानुभाव है, इससे उस 'कस्मै' (काय) क देवता के लिये [ वयम् ] हम 'हविषा' (हविः) हविः को विधेम' (दद्मः) देते हैं, या हवि के द्वारा उसकी परिचर्या करते हैं। 'हिरण्यगर्भ' क्यों ? वह सब प्राणियों का हिरण्यमय या विज्ञानमय गर्भ है। क्योंकि-वही सब भूतों के अन्तः- करण में ज्ञान रूप प्रकाश को फैलाता है। इस पक्ष में- “हिरण्यमयश्चासौगर्भश्च” अर्थात्- हिरण्यमय जो गर्भ । ऐसा समानाधिकरण (कर्मधारय) समास होता है। अथवा इसका हिरण्यमय (विज्ञानमय) गर्भ है। इस पक्ष में बहुव्रीहि समास होता है। 'गर्भ' कैसे ? गृणाति के अर्थ में 'गृभ' (ह) (क्र्या०स०) धातु से है। क्यों कि- वह सबसे स्तुति किया जाता है। अथवा 'गिरति अनर्थान्' वह सब अनर्थों को नाश करता है इससे 'गर्भ' है। अथ स्त्री का 'गर्भ' कैसे ? “यदा हि०” जब स्त्री पुरुष के गुणों को ग्रहण करती है, और इसके गुणों को पुरुष ग्रहण करता है, तब गर्भ होता है- स्त्री का रक्त या रज पुरुष के

हिन्दी निरुक्त ( ३४० ) १० अ० २ पा० ११ ख० शुक्र या वीर्य के गुण- अस्थि, स्नायु और मज्जा इन तीनों को ग्रहण करता है, और पुरुष का वीर्य स्त्री के रज के त्वचा मांस और रुधिर इन तीनों गुणों को ग्रहण करता है, तब दोनों पदार्थ मिल कर गर्भ बनता है । इन स्त्री पुरुषों के षः(६)गुणों के कारण ही इस स्थूल शरीर को ‘षाट्कौशिक’ (छः कोशों से बना हुआ) कहते हैं । अथवा जब स्त्री प्रेम से पुरुष के गुणों को ग्रहण करती है । और पुरुष प्रेम से इसके गुणों को ग्रहण करता है । तब परस्पर के अनुराग से उनको प्रमोद होता है, और उन प्रमुदित स्त्री पुरुषों के सम्पर्क से ‘गर्भ’ होता है । इस प्रकार ग्रहण क्रिया के संबन्ध से ‘गर्भ’ शब्द बनता है । 'सरस्वान्' (सरस्वत्) (१५) ‘सरस्वती’ शब्द [ ९,३,५ ] से व्याख्यान किया जाचुका । केवल लिङ्गका भेद है । “तस्य०” उस 'सरस्वत्'देवता की यह ऋचाहै॥१०(२३)॥ ( खं० ११ ) निरु०-“ये ते सरस्वन् ऊर्मयो मधुमन्तो घृत- श्चुतः । तेभिर्नोऽविता भव ॥” [ ऋ० सं० ५, ६, २०, ५ ] ॥ इतिसा निगद-व्याख्याता ॥१९(२४)॥ इति दशमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥१०,२॥ अर्थः -- “येते सरस्वन्०” इस ऋचा का वसिष्ठ ऋषि है । सारस्वत हविः में विनियोग है । हे भगवन् ! ‘सरस्वन् !’ ‘ये’ जो ‘ते’ (तव) तेरी 'ऊर्मयः' लहरियें है-जिन से तू आकाश को ढांप लेता है - मेघों से

हिन्दी निरुक्त ( ३४१ ) १० अ० ३पा० १ खं० छादन करलेता है, जो 'मधुमन्तः' मिठास वाली हैं 'घृतश्चुतः' घृत = उदक ( जल ) को झरने वाली हैं, 'तेभिः' उन से 'नः' हमको 'अविला' रक्षा करने वाला 'भव' हो ॥११(१४)|| इति हिन्दीनिरुक्ते दशमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥१०,२ तृतीयः पादः । (खं० १) निघ०-विश्वकर्मा (१६) तार्क्ष्यः (१७) मन्युः (१८) दधिक्राः (१६) सविता (२०) त्वष्टा [२१) वातः [२२] अग्निः (२३)। निरु०-'विश्वकर्मा' सर्वस्य कर्त्ता । तस्य एषा भवति ॥१(२५)॥ अर्थ :-'विश्वकर्मा' (१६) क्यों ? वह 'सर्वस्य कर्त्ता' सब का कर्त्ता है । जो कुछ और जितना भी यह भूत भविष्यत् और वर्त्तमान जगत् है, उस सब का कर्त्ता = करने वाला है। यदि सब का कर्त्ता है, तो मध्यम क्यों है ? 'कर्त्ता' क्रिया वाले = चेष्टा वाले को कहते हैं, और क्रियायें सब वायु की ही होती हैं, और पृथिवी आदि सब तत्व ( भूत ) स्थावर हैं । इससे कर्त्ता मध्यम ही होसकता है । वह सबको कैसे करता है ? पृथिवी, जल, तेज (अग्नि) और वायु इन चार वस्तुओं (द्रव्यों) से शरीर का निर्माण होता है, और उसी के द्वारा सब क्रियाएं होती हैं, जिसके कारण वह कर्त्ता कहा जाता है । भाव यह है कि- पृथिवी और जल ये दो धातु पहिले मिलते हैं, और इन दोनों मिले

हिन्दी निरुक्त ( ३४२ ) १० अ० ३ पा० १ खं० हुये धातुओं को अग्नि (तत्व) पकाता है, जिससे इनकीदृढता होती है, इसके अनन्तर विश्वकर्मा देवता अपने वायु रूप शरीर से उस शरीर में प्रवेश करके इस सब अद्भुत जगत् को कर्त्ता है, जो आत्मविचार से रहित पुरुषों को अचिन्त्य या दुर्जेय है। अर्थात् मध्यम लोक का देवता वायु है. और उसी के अनुप्रवेश से सब अन्य तत्व चलते हैं या क्रिया करते हैं, अतः उसी के अधीन सब जगत् बनता है, इस लिये मध्यम लोक का देवता वायुही विश्व का करने वाला होने से 'विश्वकर्मा' होता है । जैसा कि-वैश्वकर्मण हवि.के अधिकार में साम्- मेध में कहा है । “अथैष वैश्वकर्मणो,विश्वानि मे कर्माणि कृतान्या- सन्निति विश्वकर्मा हि सोऽभवत्” अर्थात्- अब यह विश्वकर्मा का है, 'सारे मेरे किये हुये कर्म हैं, इस से वह 'विश्वकर्मा' हुआ' । उस विश्वकर्मा देवने ऐसा ध्यान किया कि- 'सब कर्म मेरे किये हुये हैं, इसी से उसका 'विश्वकर्मा' नाम होगया । मन्त्र में भी विश्वकर्मा के मध्यम होने का लिङ्ग मिलता है । जैसे विश्वकर्मा के सूक्त में— “तमिद्गर्भं प्रथमं दध्न आपः” (ऋ०सं०८,३,१७,६) अर्थात्- जलों ने उसी को आश्रय करके पहिला गर्भ धारण किया । जल का गर्भ धारण मध्यम लोक ही में होता है । और विषुवत् कर्म में विश्वकर्मा के ग्रहके अधिकार में श्रुति में कहा है कि- “ इन्द्रो वै वृत्रमहन् स इमं लोकमभ्यजय

दमुं नु लोकं नाभ्यजयत् तं विश्वकर्मा भूत्वा- भ्यजयत् ।" अर्थात्-इन्द्र ने वृत्रको मारा, और इस लोक को जीत लिया, किन्तु उस लोक को नहीं जीता, फिर उसे विश्वकर्मा होकर जीत लिया। इस श्रुतिमें स्पष्ट रूप से ही कहा गया है कि-इन्द्र ही उस लोक के जय के अर्थ विश्वकर्मा हुआ, अतः विश्वकर्मा मध्यम ही है। और भी उसी ग्रहके पुरोरुच् के अधिकार में कहा गया है कि- "यद्यैन्द्रीं वैश्वकर्मणीं विद्यात् तयैव गृह्णीयात्" अर्थात्-यदि इन्द्र की ही ऋचाको विश्वकर्मा की जाने, उस से ग्रह करे। प्रयोजन-जो ऋचा इन्द्र की होकर विश्वकर्मा की हो, उसीसे ग्रह करे। यहाँ भी इन्द्र और विश्वकर्मा का अभेद कहा गया होता है। इस प्रकार विश्वकर्मा उपर्युक्त लक्षणों से सब स्थानों का अनुभव करने वाला होने पर भी विशेष रूप से मध्य स्थान ही है, इसी कारण से इसको मध्यस्थान देवताओं में समाम्नान किया है। "तस्य०" उस विश्वकर्मा की यह ऋचा है-॥१(२५)॥ (खं० २) निरु०-“विश्वकर्मा विमना आद्विहाया धाता विधाता परमोत सन्दृक् । तेषामिष्टानि स मिषा मदन्ति यत्रा सप्तऋषीन्पर एकमाहुः ॥” (ऋ०सं० ८, ३, १७, २) ॥ विश्वकर्मा विभूतमना व्याप्ता धाता च विधाता

हिन्दी निरुक्त * ( ३४५ ) १० अ० ३ पा० २ खं० तस्य उत्तरा भूयसे निर्वचनाय ॥२[२६]॥ अर्थः—"विश्वकर्मा०" इस ऋचाका भौवन विश्व- कर्मा प्रजापति ऋषि है । अग्नि में वैश्वकर्मण दो सूक्तों से षोडश (१६) गृहीत का होम होता है, उसमें विनियोग है । 'विश्वकर्मा' 'विमनाः' (विभूतमनाः) सर्वज्ञ है-सब का जानने वाला है, 'आद्विहायाः' (आत्मना सर्वप्रकारं महान् = व्याप्ता) आपसे भी सब प्रकार महान् है, इसी से व्यापक है, और जिससे कि-महान् तथा व्यापक है-इसी से 'धाता' सब जगत् का धारण करने वाला या उत्पन्न करने वाला है, और उत्पन्न करके 'विधाता' जीवन का विधाता है-करने वाला है, (भूतानाम्) और जीते हुए, अच्छे तथा बुरे कर्मों में लगे हुए सब प्राणियों का 'परमोत सन्दृक' (परमश्च सन्द्रष्टा) बहुत बड़ा अवधान (टकटकी) से समी- चीन प्रकार से देखने वाला है-प्रत्येक जीवके कर्मों को अलग२ देखने वाला है । 'तेषाम्' उन प्राणियों में इष्टानि' जो विश्व- कर्मा देवके इष्ट = प्यारे हैं—उसकी दैवी सम्पत् को प्राप्त हैं, (कान्तानि वा) अथवा बहुत प्यारे हैं- (क्रान्तानि वा) अथवा उससे क्रान्त हैं—उससे दबे हुए हैं—(गतानिवा) अथवा उससे प्राप्त हैं- (मतानि वा) अथवा उसके माने हुए हैं,-(नतानि वा) अथवा उस विश्वकर्मा के प्रति नम्र = झुके हुए हैं—उसके परिज्ञान से, उसमें श्रद्धा से, उसकी उपासना से और उसकी भावना से जिनके पाप दूर होगए हैं, वा, जो उस विश्वकर्मा के साथ एकीभूत (एक ही) होगए हैं,—देवता के आत्मभाव को प्राप्त होगए हैं, (तानि) वेभूत 'इषा' [अद्भिः यह] जलकी सूक्ष्ममात्राओं के साथ 'सं-मदन्ति'

हिन्दी निरुक्त ( ३४६ ) १० अ० ३ पा० २ खं० (संमोदन्ते) आनन्द भोगते हैं। कहां ? “यत्रासप्त ऋषीन् पर एक माहुः” ( यत्र एतानि सप्त ऋषीयानि ज्योतींषि, तेभ्यः परः आदित्यः, तानि एतस्मिन् एकीभवन्ति ) जहां ये जलके खेंचने वाली रश्मिएं या ज्योतिरं एक होती हैं, उनसे पर उस आदित्य मण्डल में उसके अधिष्ठाता आदित्य देव में । अर्थात्-जो विश्वकर्मा देव सब जगत् का कर्त्ता हर्त्ता और सब के शुभ अशुभ कमों का जानने वाला है, उसके जो भक्त हैं, वे उस मध्यम लोक के जल देवता के प्रसाद को प्राप्त होकर उसकी सूक्ष्म जल मात्राओं के साथ उस देवता के सदृश रूपसे आदित्य मण्डलमें आनन्दका उपभोग करते हैं,जहां अनन्त रश्मिएं एक रूप हो जाती हैं । क्योंकि-जिस देवता की पुरुष उपासना करता है,वह उसी के लोक में उसकी सात्मता तद्रूपता को प्राप्त होकर रहता है । यह इस मन्त्रका अधिदैव अर्थ है । जिस में देवता को अधिकार करके वर्णन किया जावे, वह मन्त्र का व्याख्यान अधिदैवत कहलाता है । उस व्याख्यान में मन्त्र के सब शब्दों का अर्थ उसी प्रकार कहा जाता है, जैसा कि-उस देवता में जिसकी वहां स्तुति हो, घटता हो ॥ “अथाध्यात्मम्” अब इसी मन्त्र का अध्यात्म अर्थ कहते हैं । जिसमें आत्मा के अधिकार से अर्थ कहाजावे, वह मन्त्र का व्याख्यान अध्यात्म कहलाता है । इस व्याख्यान में आत्म पदार्थ के अनुकूल ही सब शब्दों का अर्थ होता है। ‘विश्वकर्मा’ सब जगत् का कर्त्ता परमात्मा, जो प्रति शरीर में क्षेत्रज्ञ के रूप से वर्त्तमान है, और वायु की चलन

क्रिया को कर रहा है- जिसकी प्रेरणा से वायुमें चलन(हिल- ना) क्रिया उत्पन्न होती है, और वायु की क्रियासे सब प्राणी या भूत क्रियावान् होजाते हैं, इस प्रकार जो सबका कर्त्ता है- सब की क्रिया शक्ति का आधार है केवल इतनाहीनहीं किन्तु वह 'विमनाः' (विभूतमनाः) सब भूतों की ज्ञानशक्ति का आधार भी है, 'आदुविहायाः ' महान् है, केवल महान् ही नहीं, किन्तु वह 'धाता' अपनी शक्ति विशेष का रचने वाला और उस शक्ति के विषयों का 'विधाता' करने वाला भी है, 'परमः' सबसे ऊंचा है, 'सन्दृक्'(संदर्शयिता) (इन्द्रि- याणाम्) इन्द्रियों में ज्ञान के उत्पन्न करने की शक्ति कोदेने वाला है, क्यों कि- वही विषय (रूप आदि) और विषयि (इन्द्रिय) के सम्बन्ध का करने वाला तथा उन इन्द्रियों में उनके भिन्न २ विषयों के प्रति आलोक (प्रकाश) शक्ति को फैलाने वालो है, 'तेषाम्' उस विश्वकर्मा (परमात्मा)केविभूति रूप उन भूतोंमें जो उसके 'इष्टानि' प्यारे हैं,वे 'इषा' (अन्ने- नसह) अन्न या शक्ति मात्रके सहित 'संमदन्ति' (सम्मॊदन्ते) मोद को प्राप्त होते हैं- तृप्त होते हैं। कहां " यत्रा सप्त ऋषीन् पर एकमाहुः” (यत्र इमानि सप्त ऋषीणांनि इन्द्रियाणि एभ्यः पर आत्मा, तानि एतस्मिन् एकं भवन्ति ) जहां ये सब सप्तऋषीश इन्द्रिये एक होजाती है, इनसे पर (सूक्ष्म या उत्कृष्ट) आत्मा है, उसी में ये एक होती हैं, और वहीं विश्वकर्मा के इष्ट (प्यारे) मोद करते हैं । इस प्रकार यह मन्त्र आत्मा की गति या स्थिति को वर्णन करता है। "तत्र०" इस आत्म गति में आत्मा के जानने वाले

हिन्दी निरुक्त ( ३४८ ) १० अ० ३ पा० ३ खं० इतिहास कहते हैं- विश्वकर्मा भौवन ने सर्वमेध कर्म में सर्व भूतों को होम किया और अन्त में आपे को भी होम कर दिया । जिस अर्थको लेकर "विश्वकर्मा विमनाः०" यह ऋचा आत्मगति से निर्वचन की गई है, उसी इतिहास में वर्णित अर्थ को संमुख भाव से यह ऋचा कहने वाली है । "य इमा विश्वा भुवनानि जुह्वत्०" ( ऋ० सं० ८, ३, १६, १ ) अर्थात्-जिसने इन सब भुवनों (लोकों) को होम किया "तस्य०" उस मन्त्र के बहुत निर्वचन ( व्याख्यान ) के लिये यह अगली ऋचा है ॥२(२६)॥ व्याख्या "विश्वकर्मा" (१६) यह मध्यम लोकका देवता है, जो आदित्यान्तर्वर्ती पुरुष या आदित्यमण्डल के अधिदेवता या हिरण्यगर्भ की अवस्था में एक होता हुआ भी अविद्या या अज्ञान के व्यवधान (परदे) से प्रतिशरीर अलग२ जैसा होते हुआ अपनी विज्ञान शक्ति के द्वारा एक२ शरीर के (प्रत्येक के) अधिकार को अनुभव करता है, और उसके उपासक (भक्त) उसके सायुज्य या सहवास या उसके स्वरूप-प्राप्ति के सुखको भोगते हैं । यह "विश्वकर्मा" इस मन्त्रके अधि- दैवत अर्थ का संक्षेप है । यही अर्थ प्रकरणानुगत है । दूसरा अध्यात्म अर्थ मन्त्र के स्वभावाधीन आचार्य ने दिखाया है, कि-मन्त्रों के इस प्रकार अर्थ भेद भी होते हैं । अध्यात्म अर्थ में 'विश्वकर्मा' परमात्मा है, जो अज्ञान के व्यवधान

हिन्दी निरुक्त ( ३४६ ) १० अ० ३ पा० २ खं० से प्रतिशरीर भिन्न २ जीवात्माओं के रूप में प्रतीत होता है। उसकी उपासना से उसी के स्वरूप को प्राप्त होता है। यही अर्थ भले प्रकार प्रमाणित करने के लिये आचार्य ने यहां विश्वकर्मा भौवन का इतिहास भी दिखाया है, जिस में उस ने सर्वमेध = ज्ञान यज्ञ में सब भूतों को आत्मा में और आत्मा को सब भूतों में होम किया है, अर्थात्- एकात्मभाव जो परमात्मा का रूप है, उसे प्राप्त किया है। इसी इतिहास को प्रमाणित करने के लिये “य इमा विश्वा भुवनानि०” यह ऋचा भी दी है। सर्वमेध। इस शब्द के दो अर्थ हैं। एक में यह यज्ञों के समूह की संज्ञा है। जैसे-तीन (३) अश्वमेध, पांच (५) पुरुषमेध, और दो (२) वाजपेय तथा आप्तोर्याम कुल दश यज्ञों के अनुष्ठान करने से सर्वमेध यज्ञ होजाता है। और दूसरे अर्थ में ज्ञान-यज्ञ से प्रयोजन है। उस में- “यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति। सर्व- भूतेषु चात्मानं ततो न विचिकित्सति” (य०सं० ४०, ६) अर्थात्-जो ज्ञानी पुरुष सब भूतों को अपने में ही देखता है, और सब भूतों में अपने को देखता है, वह फिर सन्देह नहीं करता है, किन्तु परमात्मभाव को प्राप्त होकर नित्यसुख को प्राप्त होजाता है। इस मन्त्रोक्त भावके अनुसार अपने तत्व-ज्ञान की दृष्टि से अपने और सब जगत् के बीच में जो भेद है उसका होम कर देता है। इसी अर्थ को प्रमाणित करने के लिये आचार्य “विश्वकर्मन्०” यह और ऋचा अगले खण्ड में देते हैं।

इतिहास। इतिहास पहिले के बीते हुये वृत्तान्त को कहते हैं, और उसी के ढंग पर मन्त्रों में भी वह जहां तहां आता ही रहता है, किन्तु नित्य वेद में उसका कदापि संभव नहीं, वह यहां अपने आध्यात्मिक, आधिदैविक या आधि- भौतिक किसी अर्थ के प्रतीत होनेके लिये अर्थवाद मात्र होता है। उसका सब प्रकार का अर्थ मन्त्र में अविवक्षित होता है। कल्पित होने से केवल समझने में वह उपयुक्त होता है, फिर उसे छोड़ दिया जाता है,अर्थात्-मन्त्रों में जो इतिहास होता है, वह उसके अर्थको जानने वालोंके लिये उपदेशार्थ होता है, जिसके सहारे पर केवल अर्थ समझ लिया जाता है और फिर वह ग्राह्य नहीं होता ॥ २, (२६) ॥ ( खं० ३ ) निरु०-‘‘ विश्वकर्मन् ह॒विषा॑ वावृधा॒नः स्वयं यजस्व पृथि॒वीमु॒तद्याम् । मुह्यन्त्वन्ये॑ अभि॒तो जना॑स इ॒हास्माकं॑ म॒घवा॑ सू॒रिर॑स्तु ॥ ’’ [ऋ०सं० ६, ३, १६, ६ । य० वा० सं० १७, २२] ॥ विश्वकर्मन् हविषा वर्द्धयमानः स्वयं यजस्व पृथिवीं च दिवं च, मुह्यन्तु अन्ये अभितो जनाः सपत्नाः,इह अस्माकं मघवासूरिः-अस्तु प्रज्ञाता “तार्क्ष्यः”त्वष्ट्रा व्याख्यातःतीर्णोऽन्तरिक्षे क्षियति तूर्णम्-अर्थ रक्षति । अश्नोतेर्वा । तस्य एषा भवति- ॥ ३ ( २७ ) ॥

हिन्दी निरुक्त ( ३५१ ) १० अ० ३ पा० ३ खं० अर्थ :— “विश्वकर्मन्०” विश्वकर्मा की प्रयोगावस्था और फलावस्था दोनोंको देखकर ऋषि कहता है—हे 'विश्व- कर्मन् !' प्रयोग या यज्ञमें अवस्थित = संयुक्त' देव' 'हविषा' इस सर्वमेध की दर्शन-( ज्ञान ) सम्पत्ति से युक्त हविः से 'वावृधानः' (वर्द्धयमानः) बढ़ते हुये 'त्वम्' तुम 'स्वयम्' और उस (यज्ञ) के फलपाक के समय 'पृथिवीम्' पृथ्वी को 'उत- द्याम्' और द्युलोक को 'यजस्व' (व्याप्नुहि) व्यापन करना- हमारे यज्ञके फल देने के समय तुम सब विश्व में फैलजाना, जिससे कि कहीं भी हमें फल भोगने में त्रुटि न हो, अथवा अपने पूर्णरूप से पूर्णसामर्थ्य से हमें पूर्ण फल देना । 'अन्ये' ( सपत्नाः ) और तेरी भक्ति से विमुख शत्रु 'जनासः' जन 'अभितः' ( सर्वतः ) सब ओर से 'मुह्यन्तु' मोहित होवें । 'इह' तेरे इस दर्शनरूप उपासनो कर्म में 'अस्माकम्' हमारा 'सूरिः' ( प्रज्ञाता ) जानने वाला 'मघवा' ( इन्द्रः ) इन्द्रदेव 'अस्तु' होवे । 'तार्क्ष्य' ( ७) शब्द 'त्वष्टृ' शब्द (२,७,६) से व्याख्यात है उसके समान ही इसकी व्याख्या है। जैसे- “तूर्णम् अश्नुते” 'शीघ्र व्यापन करता है' इत्यादि । अथवा ‘तीर्णे अन्तरिक्षे क्षियति' फैले हुए आकाश में निवास करता है, इस लिये 'तार्क्ष्य' है। अथवा तूर्ण (शीघ्र) अर्थ की रक्षा करता है, इससे 'तार्क्ष्य' है । अथवा व्याप्ति अर्थ में 'अश' (स्वा०आ०) धातु से है। क्योंकि वह व्यापन कर लेता है। यहां 'तूर्ण' शब्द से' पूर्वपद ( तार् ) और 'रक्ष' या 'अश' धातु से उत्तरपद 'क्ष्य होता है। “तस्य०” उस 'तार्क्ष्य' देव की यह ऋचा है—॥३(२७)॥