निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त * ( ३४५ ) १० अ० ३ पा० २ खं० तस्य उत्तरा भूयसे निर्वचनाय ॥२[२६]॥ अर्थः—"विश्वकर्मा०" इस ऋचाका भौवन विश्व- कर्मा प्रजापति ऋषि है । अग्नि में वैश्वकर्मण दो सूक्तों से षोडश (१६) गृहीत का होम होता है, उसमें विनियोग है । 'विश्वकर्मा' 'विमनाः' (विभूतमनाः) सर्वज्ञ है-सब का जानने वाला है, 'आद्विहायाः' (आत्मना सर्वप्रकारं महान् = व्याप्ता) आपसे भी सब प्रकार महान् है, इसी से व्यापक है, और जिससे कि-महान् तथा व्यापक है-इसी से 'धाता' सब जगत् का धारण करने वाला या उत्पन्न करने वाला है, और उत्पन्न करके 'विधाता' जीवन का विधाता है-करने वाला है, (भूतानाम्) और जीते हुए, अच्छे तथा बुरे कर्मों में लगे हुए सब प्राणियों का 'परमोत सन्दृक' (परमश्च सन्द्रष्टा) बहुत बड़ा अवधान (टकटकी) से समी- चीन प्रकार से देखने वाला है-प्रत्येक जीवके कर्मों को अलग२ देखने वाला है । 'तेषाम्' उन प्राणियों में इष्टानि' जो विश्व- कर्मा देवके इष्ट = प्यारे हैं—उसकी दैवी सम्पत् को प्राप्त हैं, (कान्तानि वा) अथवा बहुत प्यारे हैं- (क्रान्तानि वा) अथवा उससे क्रान्त हैं—उससे दबे हुए हैं—(गतानिवा) अथवा उससे प्राप्त हैं- (मतानि वा) अथवा उसके माने हुए हैं,-(नतानि वा) अथवा उस विश्वकर्मा के प्रति नम्र = झुके हुए हैं—उसके परिज्ञान से, उसमें श्रद्धा से, उसकी उपासना से और उसकी भावना से जिनके पाप दूर होगए हैं, वा, जो उस विश्वकर्मा के साथ एकीभूत (एक ही) होगए हैं,—देवता के आत्मभाव को प्राप्त होगए हैं, (तानि) वेभूत 'इषा' [अद्भिः यह] जलकी सूक्ष्ममात्राओं के साथ 'सं-मदन्ति'