भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1108

दमुं नु लोकं नाभ्यजयत् तं विश्वकर्मा भूत्वा- भ्यजयत् ।" अर्थात्-इन्द्र ने वृत्रको मारा, और इस लोक को जीत लिया, किन्तु उस लोक को नहीं जीता, फिर उसे विश्वकर्मा होकर जीत लिया। इस श्रुतिमें स्पष्ट रूप से ही कहा गया है कि-इन्द्र ही उस लोक के जय के अर्थ विश्वकर्मा हुआ, अतः विश्वकर्मा मध्यम ही है। और भी उसी ग्रहके पुरोरुच् के अधिकार में कहा गया है कि- "यद्यैन्द्रीं वैश्वकर्मणीं विद्यात् तयैव गृह्णीयात्" अर्थात्-यदि इन्द्र की ही ऋचाको विश्वकर्मा की जाने, उस से ग्रह करे। प्रयोजन-जो ऋचा इन्द्र की होकर विश्वकर्मा की हो, उसीसे ग्रह करे। यहाँ भी इन्द्र और विश्वकर्मा का अभेद कहा गया होता है। इस प्रकार विश्वकर्मा उपर्युक्त लक्षणों से सब स्थानों का अनुभव करने वाला होने पर भी विशेष रूप से मध्य स्थान ही है, इसी कारण से इसको मध्यस्थान देवताओं में समाम्नान किया है। "तस्य०" उस विश्वकर्मा की यह ऋचा है-॥१(२५)॥ (खं० २) निरु०-“विश्वकर्मा विमना आद्विहाया धाता विधाता परमोत सन्दृक् । तेषामिष्टानि स मिषा मदन्ति यत्रा सप्तऋषीन्पर एकमाहुः ॥” (ऋ०सं० ८, ३, १७, २) ॥ विश्वकर्मा विभूतमना व्याप्ता धाता च विधाता